72 साल के सफर में क्या खोया-क्या पाया

Debate India News

प्रदीप कुमार की फेसबुक वाल से
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हम ख्याल और हमपेशा भाई राजेश राय का हुक्म था कि आजादी की सालगिरह के मौके पर 70 सालों के सफर में मुल्क और आवाम ने क्या खोया और क्या पाया इस पर मुक्तसर में कुछ लिखूँ । उनके हुक्म की तामीर जरूरी थी पर काफी टटोलने , तलाशने पर भी उन चीजों की फेहरिश्त नहीं बन पा रही कि आखिर हमें क्या मिला और हमने क्या खोया । काफी मशक्कत के बाद लरजती हुई जो तस्वीर जेहन में उभरी उसके मुताबिक जो कुछ भी मिला , जितना भी मिला वो अब मुठ्ठी में बंद रेत के माफिक सरकता जा रहा । समूचे हालात पर दुष्यन्त कुमार की गजल दो लाइनें बड़ी मौजूँ लगती हैं —

कहाँ तो तय था चिरागाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए ।

महात्मा गांधी ने अपने पत्र ’हरिजन’ के 24 जुलाई, 1946के अंक में स्पष्ट किया था कि आज़ादी का अर्थ हिंदुस्तान के आम लोगों की आज़ादी होना चाहिए.. आज़ादी नीचे से शुरु होनी चाहिए। महात्मा गांधी की दृष्टि में ’स्वराज्य’ का अर्थ था, सरकारी नियंत्रण से मुक्त होने के लिए निरंतर प्रयास करना। क्या यह हुआ ? दुर्योगवश आज़ाद भारत में राजसत्ता कुछ हाथों की बंधक बन गई। जिस उपभोक्तावाद और सत्ता केन्द्रीकरण को पूरी हासिल करने के मार्ग का बाधक माना गया, वही भारत में सबसे अधिक प्रभावकारी औजार बना दिए गये। परिणाम यह हुआ कि भारत की राजसत्ता को तो आज़ादी मिली, लेकिन निर्णय लेने की आज़ादी जनता के हाथों तक कभी नहीं पहुंच सकी।
आज हम सिर्फ कहने के लिए ही विकासशील हैं, देश के मौजूदा हालात देखकर नहीं लगता कि व्यवस्था या अर्थव्यवस्था में कोई परिवर्तन आया है। हां, हालात और बदतर जरूर हो गए हैं। कहने को तो हमारा देश विकासशील है और अपनी उन्नति व सफलता के नए अध्याय लिख रहा है लेकिन ये कैसी उन्नति है जहां देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा दो जून की रोटी के लिए भी संघर्ष कर रहा है, अन्य मूलभूत सुविधाओं की प्राप्ति तो उनके लिए बहुत दूर की बात है। एक ओर देश का नौजवान पढ़ा-लिखा होकर भी नौकरी को तरस रहा है, तो दूसरी ओर कुछ बच्चे प्राथमिक शिक्षा से भी महरूम हैं। ऐसा नहीं कि नौकरी न पाने वाले उन युवाओं में प्रतिभाओं की कमी है या फिर शिक्षा से दूर ये बच्चे मंदबुद्धि हैं। कमी इनमें नहीं हमारी व्यवस्था में है। जहां सबको समानता से अपनी आजाद जिंदगी जीने का अधिकार तो है, परन्तु उन अधिकारों को प्राप्त करने की सुविधाएं नहीं। आज जैसे-जैसे देश में संपन्न लोगों की संख्या में इजाफा हो रहा है वैसे-वैसे गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों व उनकी लाचारी में भी इजाफा हो रहा है।
आजादी के इस लंबे सफर में सबसे बड़ी चोट तो सामाजिक व साम्प्रदायिक समरसता और लोकतांत्रिक मूल्यों व संस्थाओं पर पड़ी है जिन्हें हमने लम्बे संघर्ष से हासिल किया और तराश कर खड़ा किया । हाल के वर्षों में इन पर हमले और तेज हो गए हैं । ऐसी कोशिशों पर एतराज जताने वालों को देशद्रोही ठहराया जा रहा । आजादी के बाद जिस सबसे बड़ी चीज को हम गंवाने की राह पर चल पड़े हैं वो है देशभक्ति की परिभाषा और जो लोग इस रास्ते को गढ़ने में जुटे हैं वो खुद स्वातंत्र्य आंदोलन की उस मुख्य धारा के विपरीत खड़े थे जिसने सम्पूर्ण राष्ट्र को न सिर्फ तमाम विभिन्नता के बावजूद एक सूत्र में पिरोया बल्कि एक नई राजनीतिक चेतना के साथ लोकतांत्रिक निजाम की बुनियाद भी रखी। उस दौर में सरकार के खिलाफ खड़े लोगों को देशभक्त कहा जाता था जबकि अब सत्ता की जन विरोधी और दमनकारी नीतियों के मुखालिफ लोगों की वतनपरस्ती पर सवाल खड़े किए जाते हैं । महात्मा गाँधी ने किसी ऐसे व्यक्ति या विचारधारा को देशद्रोही नहीं कहा जो उनके ख़िलाफ़ थी या असहमत थी। जबकि जनता के लिए उनकी ऐसी कोई भी बात पत्थर की लकीर ही होती।42 के अंग्रजो भारत छोड़ो आंदोलन में समूचा देश करो या मरो के संकल्प के साथ आहुति के लिए उठ खड़ा था। सभी अपनी अपनी क्षमता के अनुरूप अपनी भूमिका अदा कर रहे थे जबकि कम्युनिस्ट पार्टी , मुस्लिम लीग , आर एस एस के लोग और यहां तक कि अम्बेडकर भी उस आंदोलन के विरोध में थे लेकिन महात्मा गाँधी या काँग्रेस के किसी भी अन्य बड़े नेता ने आंदोलन के साथ न आने वालों या कांग्रेस का विरोध करने वालों को देशद्रोही नहीं कहा। कल्पना ही की जा सकती है कि अगर गाँधी जी किसी को देशद्रोही कह देते तो उसके माथे पर कलंक का ऐसा टीका लग जाता जिसे किसी सूरत में मिटाया नहीं जा सकता था। लेकिन वे जानते थे कि असहमत होना देशद्रोही होना नहीं । आज हम अपनी सहिष्णुता और संवाद का मिजाज खोते जा रहे। उसकी जगह एक खतरनाक नस्लीय नफरत की खेती में जुटे हैं जो हिंसक भीड़ की फसल उगा रही है जो सामाजिक समरसता के ताने बाने को झुलसाने के साथ ही दुनिया में हमारी एक सभ्य और लोकतांत्रिक पहचान को खरोंच लगा रही ।
अब थोड़ी सी बात जो हमने पाया है उस पर। हमारी आजादी और उसे हासिल करने के संघर्ष ने हमे जो सबसे बड़ी चीज दी वो है अन्याय के खिलाफ बेख़ौफ तन कर खड़ा होने की , डर को जीतने की और भविष्य के रंगीन सपनों को देखने की । यह हौसला और जज्बा मिला गांधी , लोहिया , जयप्रकाश नारायण सरीखे रहनुमाओं से जिन्होंने हमें सिखाया समता , सम्पन्नता पर आधारित , हर किस्म के भेद भाव से रहित लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था की संरचना के प्रति सतत व समर्पित मुहिम में जुटा रहना । यही वो पूंजी है जिसे जरूरत है सहेज और सम्हाल कर रखने की । इन्होंने बताया कि डरे हुए इंसानों से मरा हुआ समाज बनता है । यही वो मन्त्र है जो हमे आजादी की लड़ाई के अधूरे लक्ष्यों को हासिल करने में मदगार होगा । तो आइए क्या खोया क्या पाया का हिसाब किताब लगाने से परे दुष्यंत कुमार की गजल की इन पंक्तियों के साथ खुद को बाबस्ता रखते हुए आगे के सफर की बेचैनी को बरकरार रखें —

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये
वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

प्रदीप कुमार वरिष्ठ लेखक हैं। 
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