क़लम का जादूगर-डाॅ.राही मासूम रज़ा

Literature Uttar Pradesh

मक़बूल ‘वाजिद’
दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी पैदा होते हैं जो अपने जीवन में ही किबंदन्ति बन जाते हैं। ऐसे ही चन्द लोगोें में डाॅ. राही मासूम रज़ा का भी नाम निहायत इज्ज़त-वो-एहतराम से लिया जाता है। आप का असली नाम सैय्यद मासूम रजा आबिदी थ। आप के पिता श्री शब्बीर हुसैन आबिदी का शुभार ग़जीपुर के नामी-गिरामी वकीलों में किया जाता था। 1 अगस्त सन् 1927 को ग़ाजीपुर के गंगौली नामक एक छोटे से गाँव में आप का जन्म हुआ। इब्तिदाई तालीम घर पर और गाँव के मकतब से शुरु हुयी। फिर आगे की तालीम के लिए आपका दाखला मदरसा चश्मए-रहमत ओरियंटल कालेज गाज़ीपुर में करा दिया गया। आप बचपन से ही निहायत ज़हीन थे और हमेशा अपनी क्लास में अव्वल आया करते थे। कालेज की तालीम मुकज़्मल करके आप उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उर्दू में एम.ए. की डिग्री हासिल की। फिर उर्दू में ही ‘तिलिस्म होश रुबा’ पर अपना शोध-पत्र प्रस्तुत कर पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
शेर-वो-शायरी और मज़्मून-निगारी से आपको बचपन से ही लगाव था और दौराने-तालिब-इल्मी ही से आपने शेर में कहना शुरु कर दिया था। उन दिनों गाज़ीपुर शहर उर्दू अदब का गहवारा हुआ करता था, जहां आये दिन महफ़िले-मुशायरा एवं अदबी नशीस्तें मुन्अक़िद हुआ करते थे। तरही मुशायरा का भी आम रिवाज था। इसके अलावा अदबी महफ़िलों में अफ़साने कहानियाँ, म्ज़मून और खाके भी पढ़कर सुनाने का चलन हो गया था, जहां शायरों की तरह अदीब को भी भरपूर दाद-वो-तहासीन से नवाजा जाता था। लिहाजा डाॅ. राही मासूम रज़ा भी इन अदबी महफ़िलों में बढ़-चढ़र हिस्सा लेते थे। शुरु से ही आप की शायरी और नस्र-निगारी में जदीदियत के असरात साफ़ तौर पर दिखने लगे थे। उसी वक्त बुजुर्गों ने आप के हक़ में यह पेशेनगोई कर दी थी कि राही एक दिन उर्दू का बहुत बड़ा शायर और अदीब बनेगा और अपने नाम के साथ-साथ ग़ाज़ीपुर का भी नाम ख़ूब रौशन करेगा।
डाॅ.राही मासूम रज़ा जदीद साहबे-तर्ज शायर और मज़मून निगार थे। आप के अशआर और मज़ामीन के वतन-परस्ती, मआशरती पहलू की रंगीनी और अक्कासी जा-ब-जा आज भी देखने को मिलता है। उर्दू के साथ-साथ आपको हिन्दी पर भी ख़ासा उबूर हासिल था। लिहाजा आप उर्दू-हिन्दी दोनों में ही लिखते थे और दोनों हलक़ों में यकसाँ तैर पर मक़बूल हुए। आप डाॅ. मेहंदी रज़ा, विभागाध्यक्ष (भूगोल) अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और डाॅ. मोनिस रज़ा वाइस चांस्लर देहली यूनिवर्सिटी के हक़ीक़ी छोटे भाई थे। आप ने सन् 1951 में अपने वतन ग़ाज़ीपुर से एक उर्दू माहनामा ‘कार्टून’ भी निकाला लेकिन बहुत दिनों तक जारी न रह सका। इसी तरह कुछ अर्से तक आप ‘निक्हत’ इलाहाबाद में ही बाबस्ता रहे।
डाॅ. राही मासूम रज़ा एक बुलन्द पाया उपन्यासकार, मशहूर काहानिकार, बेहतरीन मकालमानिगार, मारु़फ-शायर और प्रसिद्ध स्क्रिप्ट राईटर थे। आप फिल्मह दुनिया,मुज़्बई से उम्र की आखिरी साँस तक जुड़े रहे। फिल्मी सन्अत में आपने वह इज़्ज़त-वो-शोहरत और कमाई कि आज भी लोग इनकी मिसाल देते हैं। उन्होंन बहैसियत एक कहानीकार,मकालमा-निगार और गीतकार तीन सौ से ज्यादः फिल्मों में काम किया, जिसमें से दर्जनों फिल्में गोल्डन और सिल्वर जुबली साबित हुयीं और बाक्स-आॅफिस पर भरी कामयाबी के साथ-साथ अच्छी कमाई भी कीं। एक जमाना था कि किसी फिल्म से सहज उनके नाम का जुड़ना ही इस बात की ज़मानत होती थी कि फिल्म को सुपरहिट होने से जब कोई नही रोक सकता। उनके लिखे फिल्मी गीत आज भी रेडियों और टी.वी. के हमेशा जवाँ गीतों में बजते सुनाई पड़ते हैं। कुल मिलाकर फिल्म-जगत में आपका शुमार मशरुफ़-तरीन हस्तियों में होता था।
आपकी शेरी और नर्सरी रचनाएं दर्जनों की तादात में उर्दू और देवनागरी लिपि में प्रकाशित होकर अवाम में ख़ूब मक़बूल हो चुकी हैं। ‘मोहब्बत के सिवा’, ‘आधा गाँव’, ‘हिज़्मत जौनपुरी’, ‘ओस की बूँद’, ‘दिल का सादा काग़ज़’, ‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी’, ‘टोपी शुक्ला’, ‘यास यगाना चंगेजी’, ‘तिलिस्म होश-रुबा’ और ‘मैं एक फेरी वाला’ उनकी ख़ास और अहम कृतियों में शुभार की जाती है। ‘यगाना की शायरी का तन्क़ीदी मुताला’ आपका अहम अदबी सरभाया है। आपने ‘शाहिद अज़्तर’ के नाम से भी कई कहानियाँ और उपन्यास लिखी हैं।
आपने देश विदेश का भ्रमण भी खूब किया। अमेरिका, यूरोप और रुस के ख़ास-ख़ास श़्ाहरों के अलावा पकिस्तान, मारिशश, हांगकांग और मलेशिया का भी अदबी सफ़र किया। फिल्मों में आने से पहले आप अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में व्याज़्याता के पद पर कार्यरत रहे।
फिल्मों के साथ-साथ आप छोटे पर्दे (टेलिविजन) से भी जुड़े रहे। टी.वी. सिरियल ‘महाभारत’ की स्क्रिप्ट आप ही के नोके-क़लम का नतीजा है। समय चक्र को प्रतीक बनाकर महाभारत के लज़्बे़-चैड़े कथानक को मात्र 45 मिनिट के मुज़्त़सर एपिसोड में पेश करने का फ़न डाॅ. राही मासूम रज़ा की क़लम का ही कमाल था। महाभारत के पहले स्क्रिट रायटर और हिन्दी जगत के प्रगाढ्य पंडित नरेन्द्र शर्मा कुछ एनिसोड लिखने के बाद ही महाभारत के विस्तृत कथा-सागर में इतने खो गये थे कि टुकड़े-टुकड़े में हज़्त़ावार टेलिकाॅस्टिंग में कहानी का तसलसुल बनाये रखने में क़ाफी उलझनें महसूस कर रहे थे कि उसी समय बी.आर.चोपड़ा के घर एक विशेष मिटिंग के दौरान डाॅ. राही मासूम रज़ा भी वहाँ किसी काम से पहुँच गये। फिर प्रोड्यूसर-डारेक्टर श्री चैपड़ा एवं पंडित जी की उलझनों को उन्होंने काल-चक्र या समय-चक्र की पहिए की तरह घूमते हुए प्रतीक के रुप में पर्दे पर पेश करके एक युग तक को कहानी में समेटने का प्रस्ताव जब रज़ा साहब ने पेश किया तो चैपड़ा जी और पंडित शर्मा दोनों ही उछल पड़े। इस तरह उनके फ़न का लोहा मानते हुए पंडित जी ने कहा कि, चोपड़ा‘ जी अब वैसे भी मैं काफ़ी बूढ़ा हो चुका हूँ टौर जहाँ प्र राही जैसे फ़न्कार मौजूद हों वहाँ भला अब मेरी क्या जरुरत’। और इस तरह उन्हीं की सिफ़ारिश पर राही साहब ने महाभारत का स्क्रिप्ट रायटिंग का काम शुरु किया। हांलाकि कुछ दिनों के बाद पंडित नरेन्द्र शर्मा का अचानक दुःखद निधन भी हो गया।
फिर तो राही ने अपनी क़लम का वह जादू चलाया कि टी.वी. सीरियल महाभारत हिन्दोस्तान के साथ-साथ विदेशों में भी दर्शकों की पहली पसंद बन गया। इस धारावाहिक की मक़बूलियत का अंदाज़ा सिर्फ़ इसी बात से बख़ूबी लगाया जा सकता कि स्त्री-पुरुष, बूढ़े-जवान और बच्चे-बच्चियाँ पूरे सप्ताह बड़ी बेसब्री से इतवार की प्रतीक्षा किया करते थे और प्रातः 8 बजते-बजते टी.वी. के पास बैठ जाते थे। सिर्फ़ यह देखने के लिए कि आज क्या होगा? फिर तो गली-कूचे, बाज़ार-दुकानें सब सुनसान हो जाया करते थे। मुझे अच्छी तरह से याद है कि रेलवे स्टेशनों पर लगे टी.वी. पर महाभारत देखने के लिए यात्री भारतीय रेल की शताब्दी और राजधानी जैसी सुपर फास्ट गाड़ियों को भी ज़बरदस्ती रुकवा दिया करते थे। धड़ाधड़ टी.वी. सेटों की बिक्री के साथ-साथ सीरियल महाभारत ने वह ज़्याति अर्जित की कि उसने टी.वी. धारावाहिकों के सारे अगल पिछले रिकार्ड तोड़ दिये और डाॅ. राही मासूम रज़ा का लाफ़नी शोहरत का मालिक बना दिया। हांलाकि महाभारत का एक प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ है और सैकड़ों बाद लोगों ने इसे पढ़ा और सुना है तथा इस पृष्ठभूमि पर अनेकों नाटकों और ड्रामों के अलावा कई फिल्में भी बन चुकी हैं परन्तु यह डाॅ. राही की क़लम का ही नतीजा था कि लोग महर्षि वेद व्यास के महाकाव्य ‘महाभारत’ को डाॅ. राही मासूम रज़ा के टी.वी. सीरियल महाभारत के रुप में देखकर अपने को धन्य मानने लगे और कुछ धार्मिक लोग तो इसका देखना और सुनना पुण्य का काम मानते हुए मर कर सीधे स्वर्ग में जाने की कामना ही कर बैठे थे। हांलाकि एक वर्ग-विशेष के कुद लोगों का यह भी आरोप था कि महाभारत जैसे पवित्र धारावाहिक की स्क्रिप्ट-रायटिंग का काम एक मुसलमान की क़लम से कराया जाना उचित नहीं है। परन्तु निर्माता निर्देशक बी.आर.चैपड़ा ने उन सारे आरोपों एवं प्रत्यारोपों को यह कह कर ख़ारिज कर दिया कि जब पंडित नरेन्द्र शर्मा जैसे प्रज़्यात विद्वान डाॅ.राही मासूम रज़ा के फ़न का लोहा मान चुके सो तो फिर मेरी क्या बिसात।
दूरदर्शन पर ही डाॅ.राही मासूम रज़ा का एक और धारावाहिक ‘नीम का पेड़’ बहुत चर्चित हुआ मगर धारावाहिक महाभारत जैसी शोहरत हासिल नहीं कर सका और जल्द ही उसका प्रसारण भी बन्द हो गया हांलाकि इस धारावाहिक का मुज़्य किरदार प्रकज कपूर अपनी सशक्त भूमिका की वजह से ही बहुत मशहूर हुआ और रातों -रात सितारा एक्टर बनकर उभरा एवं धड़ाधड़ फिल्मों तथा धारावाहिकों में काम किया। बाद में पंकज कपूर का ही बेटा शाहिद कपूर सिने-जगत में हीरो बना और आज भ सफल नायकों में शुमार किया जाता है।
15 मार्च 1922 को क़लम का यह महान जादूगर डाॅ.राही मासूम रज़ा उर्दू-अदब, हिन्दी-साहित्य, फिल्म-जगत और टी.वी. दर्शकों को रोता बिलखता छोड़कर अपने असली माबूद से जा मिला। मगर अपनी जिन्दगी में इल्म की वह क़न्दील रौशन कर दिया किरहती दुनिया तक उसका नाम अदब-वो-एहतराम से लिया जाता रहेगा। साथ ही साथ उन्होंने अपनी आने वाली नस्ल के लिए एक नई राह भी हमवार की है, जिसपर चलकर वे अपनी सिज़्त का तअय्युन करते रहेंगे। बक़ौल मरहूम ‘शेरी’ भोपालीः-
भटकें न मेरे बाद के आए हुए राही,
हर मोड़ वे क़दमों के निशाँ छोड़ दिया है।
महासचिव ‘शेरी’ अकादमी,
भोपाल 4-आम वाली मस्जिद रोड़ जहाँगीराबाद,
भोपाल-462008 (म.प्र.)

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