संस्कृत विश्व की सबसे सहज, सरल और वैज्ञानिक भाषा

Education & Career Lucknow

_ अतुल मोहन गहरवार

संस्कृत भाषा के प्रति समाज को जाग्रत करने के लिए संस्कृत सप्ताह मनाया जा रहा है। सन 2000 में रक्षाबंधन के दिन संस्कृत दिवस के रूप में मनाए जाने का निर्णय लिया गया था। तबसे रक्षाबंधन से तीन दिन पहले और तीन दिन बाद मिलाकर संस्कृत सप्ताह मनाया जाता है। हम सब संस्कृत शिक्षक जामवंत की भूमिका में हैं। हमारा यह काम है कि हम देश के सुशुप्त हनुमानों को उनकी शक्ति और सामर्थ्य के बारे में स्मरण कराएं। संस्कृत सिद्धांत रूप में भले ही कठिन हो पर व्यवहार में यह सबसे सरल और वैज्ञानिक भाषा है। यह बातें दिल्ली के विभाग संयोजक श्रीमान गवीश द्विवेदी ने विश्व संवाद केंद्र में संस्कृत सप्ताह के तहत संस्कृति भारती की ओर से आयोजित एक संगोष्ठी में मंगलवार को कहीं।

उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि हमारा सबका यह प्रयास हो कि भारत जिस कारण से भारत है यहां की ज्ञान परंपरा को जन-जन तक पहुंचना है। लॉकर में बंद ज्ञान शक्ति को विस्तृत करें। हमें सबको भारत की ज्ञानराशि के बारे में बताएं। संस्कृत पत्रकारिता को 152 वर्ष पूरे हो चुके हैं। मैसूर से प्रकाशित सुधर्मा को 152 वर्ष हो चुके हैं। तीस से अधिक पत्रिकाएं संस्कृत में निकल रही हैं। पाठकजनों की संख्या कम हो रही है। हमारे यहां गर्भ से ही शिशु की शिक्षा आरंभ हो जाती है। ज्ञान की परंपरा आजकल विलुप्त ही हो गई है। पत्रकारिता में सिर्फ उत्तर पक्ष ही नहीं पूर्व पक्ष भी आवश्यक होता है। यहां प्रश्न पूछने वाले का आशय और मंतव्य भी महत्वपूर्ण होता है। यहां संस्कृत का मतलब भाषा नहीं परिष्कृत से है। हमारे संगठन और कार्य का आधार भी शुद्ध सात्विक प्रेम है। यह मेरे भारत की भाषा है। इसे यहां के ऋषियों और मुनियों ने विकसित किया है। यहां के आंग्लभाषी भी संस्कृत का भाषण करेंगे तो इससे उनके ज्ञान में वृद्धि भी होगी। सभी भाषाओं की मूल ध्यवनियां संस्कृत भाषा से ही हुई है। हमारा ध्वनिशास्त्र बहुत समृद्ध है। जो समाज अपने धर्म और कर्म पर चलता रहे वह सुसंस्कृत और परिष्कृत समाज होता है। जड़ से यदि जुड़ा रहता है पेड़ तो वह फलता-फूलता रहता है। यह देववृक्ष इतना कमजोर नहीं है, यह निरंतर बढ़ रहा है। एक व्यक्ति के जीवन में भी बदलाव आता है तो लोग उसे देखकर अपने जीवन को उससे जोड़ते हैं। जिन्होंने स्वयं किया उनके जीवन को देखकर ही हम निरंतर आगे बढ़ते हैं। ज्ञान बड़ा नहीं होता बड़ा तो अनुभव होता है। दस किताबें लिखने वाले व्यक्ति से घुमंतू पर्यटक अर्थात तीर्थाटन अधिक ज्ञानवान हो सकता है। हमारे यहां की परंपरा में ईश्वर अर्थात सत्य की खोज के लिए पर्यटन पर निकलने वाले व्यक्ति को अधिक ज्ञानी माना गया है। हम दैनिक जीवन में संस्कृत संभाषण का प्रयोग करने की शुरुआत करें। संस्कृत वाचन के लिए “वदतु संस्कृत” पुस्तक उपयोगी हो सकता है। भारत के प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा शुद्ध, परिष्कृत और मूल्यों से संबद्ध हो ऐसा प्रयास हम सभी जमवंतों को करते रहना है। संभाषण के जरिये दो करोड़ लोग संस्कृत बोलना सीख गए हैं। पत्रकार को ही अन्ततोगत्वा सभी स्थानों पर पहुंचना है। हम पत्रकार हैं, सकारात्मकता से हमें भरा होना चाहिए। कर्ता एक है, हम सब तो कार्यकर्ता मात्र हैं। दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाली “संस्कृत वर्तावली” को चार चरणों में विभाजित किया गया है। यह केंद्रज, त्रिज्या, व्यास और परिधि में बंटा हुआ है। भाषा और संस्कृत-संस्कृति का उत्थान हो यह प्रयास संस्कृति भारती की ओर से किया जा रहा है।

संस्कृत भारती अवध प्रांत के डॉ. गौरव नायक ने विषय प्रवेश किया। विश्व संवाद केंद्र के सचिव और लखनऊ जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान के निदेशक श्री अशोक कुमार सिन्हा ने विषय प्रवेश संस्थान के प्रवक्ता डॉ. अतुलमोहन सिंह ने अतिथियों का आभार जताया।

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