संस्कृतिकर्मियों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर भीड़-हिंसा रोकने की माँग क्या कर दी…?

Cinema India News

ग़ज़ब, कमाल!!
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कुछ प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मियों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर भीड़-हिंसा रोकने की माँग क्या कर दी, मुलाबत मोल ले ली!

उनसे कुछ ज्यादा दमकते सितारों ने जवाबी पत्र लिखा है। आखिर ‘अवार्ड वापसी गैंग’ का मुक़ाबला तो करना ही है!

पर मुझे हैरानी इस तर्क पर हुई कि भीड़-हिंसा रोकने की माँग करना ‘लोकतंत्र में अविश्वास’ करना और ‘देश को अस्थिर करना’ कैसे है?

इन सितारों में अकेले कंगना रानाउत जैसी क्षमताहीन अभिनेत्री होती या सेमल मानसिंह जैसी राज्यसभा सांसद भर होतीं तो कुछ बात नहीं थी, प्रसून जोशी जैसे सुबुद्ध कलाकार भी हैं जो इधर चाटुकारिता में अपनी नयी प्रतिष्ठा अर्जित कर रहे हैं; इनमें मधुर भंडारकर जैसे फ़िल्मकार भी हैं जिन्हें प्रसिद्ध प्राप्त है।

यहाँ इसपर बहस नहीं करनी है कि कला का सत्ता से कैसा रिश्ता होना चाहिए, कलाकार की प्रतिबद्धता सरकार/सत्ता से होती है या जनता से, क्योंकि दरबारी कलाकार पहले भी होते थे। आश्रयदाता की चाटुकारिता या ‘प्रशंसा’ और विरोधी की निंदा या उपहास उनकी ‘कला’ का अंग होता था।

यह बहस भी नहीं करनी कि आखिर इस तरह उन कलाकारों की प्रतिभा का विकास हुआ या ह्रास? केशवदास कम प्रतिभाशाली नहीं थे पर आज तुलसीदास की प्रतिष्ठा के आगे केशव को कौन पूछता है?

यह सीख भी नहीं देनी कि सत्ता के साथ ही चाटुकारों-दरबारियों की टोली बदल जाती है लेकिन जनता के हृदय में बसे कलाकार अमर हो जाते हैं। यह तो हमेशा होता है कि कुछ लोग कष्ट सहकर जनता के हृदय में स्थान बनाते हैं और कुछ लोग सत्ता से जुड़कर सांसारिक वैभव लूटते हैं। यह तो अपना-अपना चुनाव है, इसपर क्या बहस करनी।

सवाल इसपर ज़रूर पूछना है कि मॉब लिंचिंग यानी भीड़ हिंसा से देश अस्थिर होता है या उसे रोकने की माँग से? किसी समुदाय के लोगों के जीवन का अधिकार कुचलने से लोकतंत्र समाप्त होता है—जैसा लिंचिंग के मामलों मे मुसलमानों और दलितों के साथ होता है, या मानवाधिकार और लोकतंत्र एक-दूसरे के पूरक हैं?

कम से कम कवि कहलाने वाले पत्रलेखक इस बात का जवाब दें। या, बाकी लोग सोचें और भविष्य की दिशा तय करें।
#अजय तिवारी फेसबुक वाल से

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