विधानसभा चुनावों के लिए टिकट बंटवारे पर विवाद …

Political News
“जिंदगी का कारवां “-भाग-3
                                          -चंद्रशेखर
जनता पार्टी और सरकार का गठन…
1 मई 1977 को जनता पार्टी विधिवत बनी । सम्भवतः लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब सरकार पहले बनी और उसकी पार्टी बाद में बनी ! जनता पार्टी तमाम घटकों से मिलाकर बनी थी । चुनाव के दौरान इन घटकों के अलग-अलग समूह थें ।उनके आधार पर टिकट बंटा । उन घटकों का जनता पार्टी में विलय हुआ।हर घटक ने अपनी ओर से महासचिव का एक नाम दिया । संगठन कांग्रेस की ओर से रामकृष्ण हेगड़े, चौधरी के लोकदल से रवि राय, सोशलिस्ट पार्टी की ओर से मधुलिमये और जनसंघ की ओर से नानाजी देशमुख महासचिव बने । जनता पार्टी बनने के बाद विधानसभा चुनाव हुए । उस समय मैं अध्यक्ष था । मैंने देखा चौधरी साहब का यूपी में जोर है उन्हें वहां का टिकट बांटने का अधिकार दे दिया जाएं । पार्टी ने यह निर्णय कर दिया । उन्होंने जिस तरह से टिकट बांटे, उससे पार्टी में असंतोष फूट पड़ा । उन्होंने अपनी पार्टी के लिए 250 सीटें रख ली । 150 सीटें जनसंघ घटक को दे दी । 25 सीटों में सबको समायोजित करने का इरादा था । इसे बड़ी ज्यादती माना गया । नानाजी ने मुझसे खुद आकर कहा कि यह बंटवारा ठीक नहीं है । मैंने चौधरी साहब से बात की । उन्होंने कहा कि प्रधान जी, मैंने बहुत सोच समझकर टिकट बांटे हैं । अब मैं कुछ हेर-फेर नहीं कर सकता । मधुलिमये से उनकी पटती थी । मैंने मधुलिमये को साथ लिया । हम दोनों उनके दामाद के घर गए । घंटों बातें हुई । हमारी समस्या यह थी कि चुनाव चिन्ह बांटने के लिए तीन दिन रह गए थे। मैंने अन्य सहयोगियों से कहा कि आपलोग उम्मीदवारों की सुची देखकर आवश्यक परिवर्तन कर दिजिए । बनारसी दास और नानाजी देशमुख,मधुलिमये वह बहुगुणा जी ने कुछ अन्य लोगों की सलाह से आवश्यक परिवर्तन का सुझाव दिया। आखिरकार मुझे चौधरी साहब की सूची में परिवर्तन करना पड़ा । 86 नाम बदल गये ।उम्मीदवारों को जो चुनाव चिन्ह का फार्म दिया जाना था ,उसपर रात भर जागकर मैंने हस्ताक्षर किया । जनता पार्टी का चुनाव चिन्ह लोकदल का था । चुनाव आयोग में वह लोकदल के चुनाव चिन्ह के रूप में दर्ज था । टिकट में बदलाव करने के कारण नाराज होकर चौधरी चरणसिंह ने एक पत्र चुनाव आयोग को भेजा । उसमें लिखा था कि हमारा चुनाव चिन्ह जनता पार्टी को न दिया जाए । उन्होंने चुनाव चिन्ह वापस नहीं लिया था । उनका पत्र पाते ही चुनाव आयोग ने जनता पार्टी से संपर्क किया । संयोग से उस वक्त रवि राय जनता पार्टी के 7, जंतर-मंतर वाले दफ्तर में बैठे हुए थे ।
उन्हें चुनाव आयोग से कहा गया कि चौधरी चरणसिंह का एक पत्र आया हैं, उसे आपलोग वापस करवाइये ,अगर यह संभव नहीं है तो नये चुनाव चिन्ह की सूचना दिजिए । कल तक का ही समय हैं । यह सुनते ही रविराय सीधे चौधरी साहब के पास गए। चौधरी साहब ने उनकी बात नहीं सुनी । वे मेरे पास आए और बोले कि कल 4 बजे तक का ही वक्त है,मैं चौधरी साहब के पास गया ,उनसे बात की । चौधरी साहब जी का कहना था कि मेरे अपने कुछ एतराज है ।उनके रहते हैं चिठ्ठी वापस नहीं लूंगा । मैंने उनसे कहा कि अगर आप चिठ्ठी वापस नहीं लेते हैं तो मैंने आयोग को नये चुनाव चिन्ह की सूचना देने के लिए पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की शाम चार बजे मीटिंग बुला रखी है,आप उसमें आने की कृपा करें । उसके लिए पार्टी की बैठक बुला कर नये चुनाव चिन्ह का फैसला वक्त से पहले मुझे करना होगा । इसपर चौधरी चरणसिंह ने थोड़ा सोचा और कहा कि चंद्रशेखर,रूको । फिर करतार सिंह को बुलवाया जो उनकी सिक्योरिटी में थें ।
उन्हें चिट्ठी खोजने में लगाया । वह चिठ्ठी मिली और वह वापस करवाई गई । चुनाव प्रचार के लिए प्रारंभ में चौधरी चरणसिंह और जगजीवन बाबू तैयार नहीं थे । उन्हें यूपी बिहार के उम्मीदवारों के चयन पर असंतोष था, इससे रामकृष्ण हेगड़े परेशान थें । वही केंद्रीय कार्यालय का सारा काम देखते थे, उन्हें चिंता हुई । मैंने उनसे कहा कि चिंता मत किजिए । दोनों नेताओं को पत्र लिख दिजिए कि दो चार दिन में वे स्वयं आपको पत्र लिखें ।इन चुनावों में नेताओं के प्रचार की कोई जरूरत नहीं । जनता स्वयं वोट देने के लिए तैयार हैं ।मैंने अपना दौरा प्रारंभ कर दिया । कुछ दिन नेताओं की नाराज़गी चली, फिर स्वयं प्रचार में लग गए । विधानसभा चुनाव में पार्टी काम करने लगी थी ।मेरी कोशिश सभी समूहों को मिलाकर चलने की थी ।यही अपने आप में कठिन काम था । पार्टी के सामने नया राजनीतिक दर्शन क्या हो ,इसे तय करने का वक्त नहीं मिला । जो समूह पार्टी में थे ,उनकी अपनी-अपनी मान्यताएं थी । शुरुआत में न कोई कार्यक्रम था और न कार्यशैली । काम चलाउ व्यवस्था थी । ‘दूसरी आज़ादी ‘ का बुखार बना हुआ था । किसी ने पार्टी और उसका सिद्धांत बनाने की तरफ ध्यान नहीं दिया । विधानसभा चुनावों के बाद यह काम चलाउ व्यवस्था केंद्र से उन राज्यों में भी पहुंच गई जहां जनता पार्टी की सरकारें बनी । ऐसे आठ राज्य थें । मैं महसूस करता हूं कि जनता पार्टी एक सीमित उद्देश्य से बनी थी । लोकतंत्र की वापसी के बाद उसका उद्देश्य पूरा हो गया था । अनेक नेता थे जिन्होंने अपनी निजी बातों को सैद्धांतिक जामा पहनाया । कुछ महीने बाद ही जनता पार्टी में सत्ता संघर्ष शुरू हो गया ।
सबसे कठिन काम पहली कतार के नेताओं में तालमेल पैदा करना था । इसमें तीन लोग आते थे —–मोरारजी देसाई, चौधरी चरणसिंह और जगजीवन राम । शुरुआत में मुझे चारों ओर से सलाह दी गई कि नानाजी देशमुख से सावधान रहिएगा । ऐसी सलाह देने वालों में मेरे मित्र, जनसंघ वाले और कुछ पत्रकार भी थे । लेकिन ढाई वर्ष के दौरान मुझे नानाजी देशमुख से शिकायत का एक भी मौका नहीं मिला ।
नानाजी अकेले व्यक्ति थे , जिन्होंने मुझे बताया कि चौधरी चरणसिंह का कहना है कि जनसंघ घटक को ज्यादा सीटें दे दी है ,वे इस विवाद में न पड़ें । पर नानाजी इससे सहमत नहीं हुए । और यूपी की सूची में वांछित परिवर्तन करने में पहल भी उन्होंने ही की ।
आम धारणा है कि जनता पार्टी दोहरी सदस्यता के सवाल पर टुटी। यह राजनीतिक बहाना था । इसी बहाने झगड़ा खड़ा किया गया। मैंने इसमें से रास्ता निकालने के प्रयास किए । सीधे बात हुई । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं से संपर्क साधा । बाला साहेब देवरस और रज्जू भैया से बात की । उन लोगों का रूख सकारात्मक था । जैसे ही मुझे सफलता मिलने लगी , दिल्ली में खुट खुट तेज हो गई । सत्ता गलियारे में भागदौड़ बढ़ी ।कई नेता अपने निजी कारणों से पार्टी तोड़ने में लगे हुए थे । अध्यक्ष के रूप में मुझे कभी परेशानी नहीं हुई । किसी से भी और कभी भी मैं बात कर सकता था । मुश्किल काम था तीन नेताओं का समन्वय का । उनसे औपचारिक बातचीत होती थी । ज्यादातर बातचीत उनकी आपसी समस्या को लेकर होती थी ।अगर उन नेताओं में एक एक कामचलाउ समझ पैदा हो जाती तो जनता पार्टी को टुट से बचाया जा सकता था ।
एक बात लोग हरदम भूल जाते हैं कि जनता पार्टी जब बनी थी तो मानसिकता तानाशाही के खिलाफ लड़ने की थी । लोग प्रजातांत्रिक मूल्यों की स्थापना चाहते थे ।वह एक चुनौती थी ।उसे पूरा कर लेने के बाद मान्यता और मानसिकता बदल गई । देश को बनाने और उसके लिए नई नीतियां अपनाने का तकाजा सामने आया । उसमें विचारों की विभिन्नता सामने आई । विचारों की विभिन्नता को तालमेल से कम किया जा सकता है लेकिन जब नेता व्यक्तिगत कारणों से अपनी बातों का अधिक महत्व देने लगें और सैद्धांतिक जामा भी पहनाने लगें तो पार्टी को बचाना मुश्किल होता हैं । जनता पार्टी के साथ यही हुआ ।
इन नेताओं में बहुत छोटी-छोटी बातों पर आपसी मनमुटाव पैदा हो जाता था ।
बहुत छोटी-छोटी गलतियां की गई । एक दिन चौधरी चरणसिंह ने मुझसे कहा कि मेरा दामाद पुलिस में था, उसको मोरारजी भाई ने बिना मुझसे पुछे विदेश में नियुक्त करा दिया । मेरा बेटा अमेरिका में रहता है , उससे मेरा लगाव नहीं, मेरा मन कभी-कभी उदास हो जाता है है तो दामाद के घर चला जाता हूं । चौधरी चरणसिंह ने यह बात जब मुझे बताई तो उससे पहले प्रचार किया गया था कि उन्होंने ही यह नियुक्ति करवाई है । इधर चौधरी साहब मुझसे कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री जी को एक बार मुझसे पूछ लेना चाहिए था । एक दिन सुबह-सुबह चौधरी साहब कह गए कि मुझे बता दें कि उनके साथ डाक्टर जाता था,उसे प्रधानमंत्री ने मना कर दिया है । मुझे यकीन नहीं हुआ। सोचा कि यह गलतफहमी का नतीजा है । मोरारजी भाई क्यों किसी डाक्टर को रोकेंगे ?  यह मुझे बुरा लगा । सुबह सात बजे मैंने मोरारजी भाई को फोन किया । और कहा: मोरारजी भाई ,आपने चौधरी साहब के साथ जानें वाले डाक्टर को मना करा दिया ? उनको याद था ।
तपाक से बोलें :, हां ,मना करा दिया । मैंने कहा: आपने ऐसा क्यों किया ? मैं उनकी बात सुनकर हैरान था । डाक्टर तो चौधरी साहब के साथ जाना ही चाहिए । मोरारजी भाई का जबाब था कि जब उनके साथ डाक्टर नहीं जाता है तो चरण सिंह के साथ क्यो  जाएं ?
मैंने कहा: आपको ह्रदय रोग नहीं है,उनको हैं , इसलिए डाक्टर जाना चाहिए ।
चौधरी साहब उस दिन शायद लखनऊ जा रहें थे और उनके साथ उनके दामाद डाक्टर जेपी सिंह छुट्टी लेकर गये । ऐसी बहुत – सी साधारण कठिनाइयों से होकर मुझे गुजरना पड़ता था । छोटी-छोटी बातें बढ़ती गई ।
आपसी तालमेल के अभाव में तिल का ताड़ बनता गया ।
                                                              -राजेश ®️✍️
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