विकास के साथ सम्यक् आर्थिक नजरिया जरूरी

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ललित गर्ग –

केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में आम बजट प्रस्तुत किया। भारत को अगले पांच साल में पांच लाख करोड़ डाॅलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य का रोडमैप इसमें झलक रहा था। इसके लिये कृषि आधारित बुनियादी ढांचा बनाने, नये अवसर तलाशने, कृषि संस्थानों को मजबूत बनाने, बेरोजगारी दूर करने और सार्वजनिक-निजी साझेदारी को मजबूत बनाने के लिये बड़े निवेश की जरूरत इस बजट में व्यक्त हुई है। यह बजट गरीबों और किसानों को समृद्ध बनाने के उद्देश्य से ग्रामीण भारत की तस्वीर को बदलने की ओर कदम बढ़ाने वाला है। शांत एवं स्थिर प्रवृत्ति के इस बजट में मध्यम वर्ग एक बार फिर उपेक्षित हुआ है और कारोबार की सुगमता एवं जीवन की सहजता कैसे हो सकेगी, यह प्रश्न फिर भी खड़ा है। मोदी सरकार का आर्थिक विकास यदि धन के प्रति सम्यक् नजरिया विकसित कर सका तो अनेक समस्याओं से मुक्ति सहज ही मिल सकेगी।
तेज विकास के लिये रोडमैप तैयार करता हुआ यह बजट आम-जन की सहभागिता और उसके व्यापार, उद्यम एवं क्षमताओं की कितनी जमीन तैयार करेगा, एक संदेहभरा वातावरण लिये हुए है। भारत की अर्थव्यवस्था की बड़ी विसंगति रहा कि यहां एक तरफ गरीब है तो दूसरी तरफ अति-अमीर है। इन दोनों के बीच बड़ी खाई है। इनके बीच की दूरियां इस बजट से भी दूर होती हुई नजर नहीं जा रही है। आशा की गयी थी कि मोदी सरकार के बजट आर्थिक विसंगतियों को समाप्त करने का माध्यम बनेंगे, आशा तो अभी भी है, लेकिन इस बजट से वह पूरी होती हुई नजर नहीं आ रही है। जीवन के आसपास गुजरते अनुभवों की सत्यता यही है कि मनुष्य धन के बंधनों में घुटा-घुटा जीवन जीता है, जो परिस्थितियों के साथ संघर्ष नहीं, समझौता करवाता है। हर वक्त अपने आपको असुरक्षित-सा महसूस करता है। जिसमंे आत्मविश्वास का अभाव अंधेरे में जीना सिखा देता है। जिसके द्वारा महत्त्वाकांक्षाओं का बोझ ढोया जाता है। जिसके लिए न्याय और अधिकार अर्धशून्य बन जाता है। जिससे सफलताएं दूर भागती हैं और जिसमें न उद्देश्य की स्पष्टता होती है और न वहां तक पहुंचने के लिए छलांग भरने की ताकत।
धन की आसक्ति में डूबा आदमी सहना नहीं जानता। वह कष्टों से बहुत जल्द घबरा जाता है और घबराया मन कभी कोई नयी संरचना नहीं कर सकता, इसीलिए वह जहां होता है वहीं अपने आपको ठीक मान लेता है, ऐसी मनोवृत्ति कभी क्रान्ति का स्वर बुलन्द नहीं कर सकती, सड़ी-गली परम्पराओं को स्वस्थता नहीं दे सकती और बनी-बनाई परम्पराओं से हटकर नए आदर्शों, सिद्धांतों और जीवन्तता की मिशाल नहीं बन सकती।
मोदी सरकार धन के प्रति एक नये नजरिया विकसित करने को तत्पर है। कहा गया है कि ‘जो अपने सिर पर मुकुट धारण करता है, वह सदा चिंतित रहता है।’ बात ठीक है। जिसकी तिजोरियां भरी रहती हैं, वह निरंतर भयाक्रान्त रहता है और उसे अपने धन की रक्षा के लिए फाटक पर संगीनधारी चैकीदार खड़ा करना पड़ता है। लेकिन सरकार की सख्ती से रक्षा कौन करेगा? उसकी नींद हराम है। इसके विपरीत, जिसके पास धन का सम्यक् नजरिया होता है वह चैन की नींद सोता है, डर उसके पास फटक नहीं पाता। कुछ ऐसी योजनाओं के द्वारा वैभवता को भी सम्यक् बनाने की कोशिश की जा रही है, यह नये आर्थिक अभ्युदय का द्योतक है।
हम भौतिकवाद से हटकर केवल अध्यात्मवाद के आधार पर जीवन यात्रा को नहीं चला सकते इसीलिए धन के प्रति सम्यक् और समन्वित दृष्टिकोण जरूरी है। प्रसिद्ध इतिहासकार टायनबी ने एक बहुत अच्छी बात कही है-कोरी रोटी और कोरी आस्था दोनों अपर्याप्त है। मनुष्य केवल रोटी के आधार पर जी नहीं सकता और केवल आस्था के सहारे भी नहीं जी सकता। अब तक की शासन व्यवस्थाओं की विडम्बना रही है कि उनमें रोटी दी थी तो आस्था छीन ली थी और जहां आस्था थी वहां रोटी की समस्या खड़ी रहती थी। इन दोनों-रोटी और आस्था के बीच बढ़ती दूरी ने अनेक विसंगतियों को जन्म दिया है। इस विसंगति को दूर करते हुए क्या एक आदर्श अर्थ-व्यवस्था का स्वप्न साकार करने की दिशा में मोदी सरकार सफल हो सकेगी?
भारतीय संत मनीषा ने धन के प्रति सम्यक् नजरिये और सम्यक् आजीविका की बात कही है। भगवान् महावीर ने कहा-खणमेत्त सोक्खा बहुकाल दुक्खा-भौतिक सुख क्षणिक और परिणाम में दुखद होता है। इस तरह की विडम्बनापूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में अर्थ की चिन्ता तो रही है, पर जीवन का कोई मूल्य नहीं रहा। ऐसी जीवनवृत्ति, जिसमें समाज के किसी भी अंग पर दुष्प्रभाव न पड़े सम्यक् आजीविका है और इस आजीविका से प्राप्त धन ही हमारे लिए उपयोगी और हमारी सही मानसिकता के निर्माण के लिए आवश्यक है। हमारी आजीविका की सहजता हमारी सकारात्मक मनःस्थिति के निर्माण में भी सहायक होती है। आज हमारे जितने क्रियाकलाप अथवा आजीविका के स्रोत हैं, वे उदरपूर्ति के निमित्त धन प्राप्त करने के लिए नहीं, अपितु बाह्याडंबरों और झूठी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए ज्यादा हैं। क्या इस तरह की विसंगतिपूर्ण आर्थिक सोच से मुक्ति मिल सकेगी? हम यह कभी नहीं सोचते कि जिसकी हमें आवश्यकता नहीं है, उसे हम संग्रहीत करते हैं तो उस व्यक्ति का हक छीनते हैं, जिसको उसकी आवश्यकता है। जहां ढेर होता है वहां स्वतः ही गड्ढा हो जाता है। जहां महल खड़ा होता है वहां अनिवार्यतः बहुत-सी झोपड़िया जन्मती हैं। वस्तुतः प्रकृति का नियम ही ऐसा है। वह जिसे जन्म देती है, उसे दो हाथ भी देती है। दोनों हाथों से कर्म करो, रोज कमाओ, रोज खाओ।
संग्रह का अर्थ होता है दूसरे को उससे वंचित करना। आज कुछे धनाढ्य लोगों ने अधिकांश साधन अपनी मुट्ठी में बंद कर रखें हैं। इसी से हम घोर विषमता के दुष्चक्र में फंसे हैं। जमाव अभाव का जनक होता है और इसी से हिंसा, आतंक, विद्रोह, विसंगति, शोषण जैसी स्थितियां पैदा होती हैं। एक तरह से अशांति और अराजकता का मूल कारण सरकार की पोषित गलत आर्थिक नीतियों से पैदा हुए ये चन्द धनाढ्य लोग ही है। मोदी सरकार इस दिशा में कोई ठोस निर्णायक भूमिका का निर्माण कर सकी तो उनके नये भारत के निर्माण में ऐसी नवीन आर्थिक नीतियों एवं सोच का बड़ा प्रभाव होगा। जैन दर्शन में इसी बात को अर्जन के साथ विसर्जन की अनिवार्यता के रूप में कहा गया है। महात्मा गांधी ने ट्रस्टीशिप का सिद्धांत कुछ इन्हीं भावनाओं को ध्यान में रखते हुए दिया था। ये सभी कह सकते थे कि पहले अपना पेट भरो, तब दूसरों की चिंता करो। पर इसके विपरीत सभी ने त्याग की बात कही है। जीवन उसी का सार्थक है जो दूसरों को खिलाकर स्वयं खाता है ऐसा व्यक्ति परिग्रह की कल्पना भी नहीं कर सकता। ‘नेकी कर दरिया में डाल’ उसका लक्ष्य बनता है इसलिए वह बिना पुरुषार्थ परिणाम नहीं चाहता। यही सोच विकसित करके भारत को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बना सकेंगे। प्रेषकः

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