लार्जर दैन लाइफ …

Cinema Maharashtra
मधुसूदन

यह महादेश ‘लार्जर दैन लाइफ ‘ नायकों का देश है। मानवता के उच्चतम आदर्शों की सबसे उर्वर धरा। राम सा राजा, भरत लक्ष्मण सा भाई, सीता सी पत्नी और वधू, हनुमान सा सेवक, कृष्ण सा नीतिज्ञ, राधा या पार्वती सी प्रेमिका, शिव सा देवत्व किसी और जमीन पर न हो सकेंगे। यह धरती अपने नायक जनती भी है चुनती भी है।

नायकत्व देश-काल और तवारीखों- तारीखों से परे होते हुए भी असम्पृक्त तो नहीं है। कोई तिथि रही होगी जब हूणों को भगाया होगा। कोई दिन रहा होगा जब गौ, देवता,धर्म, ब्राह्मण और स्त्री के सम्मान के हेतु आर्यपुत्र अपने शीश मृत्यु के देवता को सौंपने निकल पड़ते होंगे।

कोई होरा रही होगी जब राजपूतों, गुप्तों, चोलों,चालुक्यों, प्रतिहारों, समुद्रगुप्त, शिवाजी की तलवारें स्वधर्म और अपने भूमि की रक्षा के लिए म्यानों से बाहर लप लप दीप्त हो उठती होंगी। कोई मुहूर्त होगा जब सावरकर, बोस, आजाद तय कर लेते होंगे कि हम रहें न रहें यह धर्म-राष्ट्र रहेगा।

काल ने ऐसे ही कुछ ‘अनसंग हीरोस्’ पर फिर एक बार गर्व करने का अवसर दिया है। एक तो के परासरन! पूरे देश में गिनती के लोग होंगे जिन्होंने इस योद्धा से अधिक उम्र पाई होगी। लगभग ९२ वर्ष से अधिक आयु के ‘केशव परासरन’ आज एक जाना पहचाना नाम हैं। ‘निर्बल के बल राम’ और उस ‘रामलला विराजमान’ के पक्ष में खड़े हैं केशव। उस अयोध्या के पक्ष में खड़े हैं केशव जिस अयोध्या की तरफ हाथ करके शपथ लिया जाए तो पंचायत मान जाती है। अब तर्कणा और विमर्श की आवश्यकता ही नहीं। राम की शपथ राम के अयोध्या की शपथ। हर व्यक्ति विश्वास करेगा।

उस राम के पक्ष में खड़े होना भी कितने सौभाग्य की बात कि जिसके नाम पर गिनतियों का प्रारम्भ होता हो। राम, दू, तीन, चार….। उस राम के पक्ष में खड़े होना जिसके नाम के पत्थर आज भी तैरते हैं। खैर, परासरन कहते हैं कि यह सबसे कम है जो वह रामजी के लिए कर सकते हैं।

रामराज्य की संकल्पना में जो नायकत्व का गुण है लह कुछ ऐसा है कि नायक वह जिसका व्यक्तिगत जीवन सामाजिक जीवन के लिए केवल एक साधन मात्र हो, नायक वह जिसकी व्यक्तिगत चेतना सामाजिक चेतना में रच बस जाए। नायक वह जो लोक की शुभाकांक्षा में अपनी महत्वाकांक्षा बिसरा दे।

मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे एस के कौल पूर्व अटार्नी जनरल परासरन को भारत में वकालत का पितामह कहते हैं। पद्मभूषण पद्मविभूषण केशव परासरन प्रारम्भ से ही धर्म संस्कृति और पारम्परिक पवित्रता के पक्ष में खड़े रहे हैं। सबरीमाला, राम मन्दिर, सेतु समुद्रम के पक्ष में खड़े हुए हैं।

सबरीमाला की पैरवी के समय उन्होंने तर्क दिया कि अदालत इस मामले में गलत सवाल पूछ रही है। उन्होंने न्यायाधीशों से कहा, ‘अगर कोई व्यक्ति यह पूछे कि क्या वह प्रार्थना के दौरान धूमपान कर सकता है तो उसे एक थप्पड़ पड़ेगा, जबकि अगर वह यह पूछता है कि क्या वह धूमपान करते हुए प्रार्थना कर सकता है तो उसकी सराहना होगी। इसी तरह सही सवाल पूछे जाने पर सही जवाब प्राप्त होगा, जबकि गलत सवाल पूछने पर गलत जवाब मिलेगा।’

जिरह के दौरान परासरन ने कोर्ट में भगवान अय्यप्पा की ब्रह्मचारी प्रकृति को समझाने के लिए सुंदरकांड और रामायण के अंशों को पढ़ा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने फैसला उनके खिलाफ दिया और महिलाओं को मंदिर में जाने की अनुमति दी।इससे पहले एक और मामले में वह सुर्खियों में रहे। राम सेतु केस में जब दोनों विरोधी पार्टियां परासरन के पास पहुंचीं तो उन्होंने सरकार के खिलाफ जाकर, सेतुसमुद्रम परियोजना से सेतु की रक्षा करने का निर्णय लिया।

जब जजों ने परासरन से पूछा कि वह सरकार का विरोध क्यों कर रहे हैं तो उन्होंने स्कंद पुराण का जिक्र किया, जिसमें इस सेतु का वर्णन है।

दूसरे सुब्रह्मण्यम स्वामी! एक तो इन महाराज का नाम ही हमें बहुत प्रिय है। प्रोफेसर और अर्थशास्त्री स्वामी ‘पालिटिकली इनकरेक्ट एंड अनप्रेडिक्टेबल’ दिखते हैं पर हैं नहीं। इनके ‘लांग टर्म गोल्स’ बहुत स्पष्ट रहते हैं। दोस्त और दुश्मन बनाते बिगाड़ते रहते हैं। संस्कृति संस्कृत और धर्म पर इनका आग्रह विशेष है। सोनिया जी से इनका लगाव किन्हीं कारणों से बहुत विशेष भी है। राजनीति में शशि थरूर और सुब्रहमण्यम से मजेदार व्यक्तित्व हाल फिलहाल कोई नहीं।

भविष्य क्या होगा अभी तय नहीं। अतीत में इनसे क्या भूलें हुईं, कोई फर्क नहीं पड़ता। परासरन, सुब्रह्मण्यम स्वामी और हर वह व्यक्ति जो राम के पक्ष में आक्रांताओं, आततायियों और वितण्डावादियों के विरुद्ध खड़ा है, आज का लोकनायक है।

 

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