मीना कुमारी : एक नज्म़ जो दर्द से भरी थी, शून्य के भी आँसू आँखों से लहू बनकर टपके थे…

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मीना कुमारी के जन्म दिवस पर उन्हें याद करते हुए

-एसके दत्ता

” तेरी याद धडकती है मेरे सीने में | जैसे क़ब्र के सिरहाने शमा जला करती है || तुमने कभी समन्दर के किनारे बैठकर खामोश लहरों को देखा है , जो आहिस्ता – – हौले – हौले लहरों से अठखेलियां करती हुई तुम्हारी तरफ बढ़ती है — और तुमको छूती हुई एक मीठी सी भीनी सी प्यार के एहसास का खुशबु देकर वापस मुडती है तो उस मीठी और भीनी खुश्बुओं के एहसास के साथ कितना दर्द लेकर वो जाती है | नहीं पता न तुम्हे – नीले आसमान पे सफेद रुई के फाहे की तरह बादल को जब तुम देखते हो तो वाह कर देते हो कभी तुमने उनके अन्दर के काले स्याह रंग को महसूस किया है वो रंग कितने दर्दो की पीड़ा का एहसास है। शांत लहरों में समन्दर का खामोश सफर अपने गहराइयो में अनेक तुफानो को छुपाये निरंतर अबाध गति से बहते हुए पानी के तरंगो को महसूस किया है । महजबींन ? ” चाँद तन्हा है , आसमा तन्हा दिल मिला है , कहा कहा तन्हा बुझ गयी , छुप गया तारा थरथराता रहा धुवा तन्हा जिन्दगी क्या इसी को कहते है ? काश मीना कुमारी सिर्फ नारी होती – सिर्फ औरत तो मुमकिन न था कि मेरी कलम में सरगोशी न होती – मीना जी तो सागर की अतल गहराइयों की तरह विशाल हृदयागिनी थी | एक ऐसी प्रेम पुजारन थी जिसके प्रेम में राधा की मूरत देखी जा सकती है उनके प्रेम के एहसास में कशिश थी एक जज्बाती शायरा जिसके लिखे नज्मो के हर हर्फो में एक दर्द का गुबार झलकता है | बेहतरीन अदाकार – भारतीय संस्कृति को अपने रूप में समेटे यौवन की मलिका – सीरत की अनुपम धरोहर के साथ ही ममता का आँचल लहराए देवी ” महजबीन ” थी | जिन्दगी की पूरी एक गजल | जिसके हर सफा पे वफा का तरन्नुम था | लम्हों को पीने वाले उनके लरजते होठो पर ” आबे कौसर ” की बुँदे शबनम की तरह टपकती थी | प्यार के एहसास की गीत – प्यार के एहसास से भी प्यार मगर संगदिल कुदरत ने दिल को आँखे तो दी मगर नजर को जुंबा नही दी | तन्हा , ता उम्र ढूढती रही शहरे – दिल में अपनी मुहब्बत का मका नही मिला | कुछ पल के लिए ठहरी पर महबूब ही बेवफा निकला | फिर वो अपने दर्दे – दिल की संकू के लिए निजी डायरी के सफ़ेद कैनवास पर अपने घायल जज्बातों को दफनाती रही मरते दम तक | मीना जी लगभग 42 वर्ष पहले कब्र में तो दफ्न हो गयी मगर आज भी दिल और रूह के संकुंन के लिए दुआ में उनके हाथ फलक की तरफ उठा करते है | 1 अगस्त , 1932 बम्बई के दादर स्थित रूपतारा स्टूडियो के सामने वाली चाल में अली बक्श और प्रभावती ( इकबाल ) की दूसरी संतान के रूप में ”महजबीन” का जन्म हुआ था | दौलत के लालची बाप ने चार साल की नन्ही से महजबीन को निर्देशक विजय भट्ट के सामने बाल – कलाकार के रूप में लेने की पेशकश की विजय भट्ट ने 1935 में नन्ही महजबीन को बेबी मीना नाम देकर फिल्म ” लेदर फेस ” में बेजान कैमरे के सामने खड़ा कर दिया | बचपन की चंचलता , शैतानियाँ , नटखटपंन – अल्हड़ता , मासूमियत और वात्सल्य ने नन्ही सी महजबीन के चेहरे पर एक नकली चेहरे का लिबास डाल दिया | परिवार की भूख मिटाने के लिए वे नाजुक उम्र में दौलते — दरख्शा ” बन गयी | जैसे ही यौवन ने उम्र की दहलीज पर दस्तक दी और बेबी मीना महजबीन ने अंगडाई ली चौदह वर्ष की कमसिन उम्र में उसे नायिका मीना कुमारी बना दिया गया | एक अभिनेत्री के तौर पर मीना जी अपने चाहने वालो के लिए परिचय की मोहताज नही रही | नकली किरदारों में मेकअप किया हुआ उनका चेहरा अक्सर दीख जाता | उनके चेहरे पर उठने वाली अभिव्यक्ति के भाव और आवाज की लरजिश आज भी दर्शको के दिलो – दिमाग पर छाए हुए है | मगर असल में महजबीन कैमरे के पीछे रहती जो इन्सानों से बेपनाह मोहब्बत करती | वफा की उम्मीद पर जीती और पवित्र रिश्ते पर भरोसा करती | मीना कुमारी फिल्मकार कमाल अमरोही से बेपनाह मोहब्बत की | उनसे निकाह किया और उनकी बेगम कहलाई मगर वो अपने निकाह के दो वर्षो को वे जन्नत कहती थी यह भी कहा जाता है की मीना कुमारी ने कमल साहब से तलाक ले लिया था | बाद में फिर कमाल साहब ने मीना जी का निकाह अपने सेक्रटरी से करवाया और तलाक दिलवाकर फिर निकाह किया | कमाल साहब खुद भी एक मशहूर फ़िल्मकार थे मगर आज भी मीनाकुमारी के बगैर उनका तारुफ़ पूरा नही होता है | कमाल साहब को जीते जी इस बात का मलाल था कि वे अपनी बेगम की पहचान से जाने जाते है , नतीजा इस रिश्ते में इतनी कडवाहट आई की कमाल साहब मीना जी को डण्डो से मारते थे | अश्क उनके गालो पर तैरता था , बेबस आँखों से चिल्लाती थी और ढलते सूरज के साथ दहशत उन्हें निचोड़ती थी | देखा जाए तो बीबी की शोहरत से पति को चिढ सी थी | अमरोही साहब का नाम था पर मीना जी के नाम के नीचे | यह उनके लिए एक दर्द था जिस नाते पूरी जिन्दगी उन्होंने मीना को ” खराब बेगम कहा | शौहर से प्यार के तलाश और उनसे प्यार न मिल पाने के कारण मीना जी ने बाहर प्यार तलाशना शुरू किया | एक रिश्ते की चाहत की बिना पर रिश्तेदार सहित बहुत से लोग उनकी जिन्दगी में आए | सबने बस उन्हें छला उसने बेवफाई की | ईनाम में उन्हें सिर्फ अपने दामन पर दाग मिले | मीना जी के करीबियों में कई लोग आज भी मौजूद है | वे भले ही सच को अपने होठो पर नही लाते मगर मीना जी का चेहरा उनकी कामयाबी पर जरुर दीखता है | उनके करीबियों में ” गुलजार ” ” राजेन्द्र कुमार ” ” महमूद ” ” धर्मेद्र और सावन कुमार टाक प्रमुख माने जाते है | मीना जी ने बहुत ही ईमानदारी से अपने करीबियों के रिश्तो का जिक्र किया है | गुलजार साहब को वो सबसे ज्यादा जहीन मानती थी इसीलिए वे अपनी निजी डायरी अमानत के तौर पर उन्हें सौप गयी | मीना जी भावनात्मक तौर पर धर्मेन्द्र से इस कदर जुडी की उनके रिश्ते की खैरियत भारत के राष्ट्रपति पूछते | प्रसिद्द फिल्म छायाकार राम औरंगाबादकर के साथ नेहरु जी की प्रतिमा लगवाने के सिलसिले में एक बार वे राष्ट्रपति सर्वपल्ली डा राधा कृष्णन से मिलने गयी तो उन्होंने पहला सवाल किया ” तुम्हारा बॉय फ्रेंड कैसा धर्मेन्द्र कैसा है ? यही नही जब उनके करीबियों ने उनसे कहा कि जिस आदमी यानी धर्मेन्द्र की मदद के लिए आप जान तक कुर्बान करने को तैयार है वह बगैर मतलब — आपकी सूरत तक देखना पसंद नही करता ?

मीना जी मुस्कुराई

धरम के साथ फिल्मे साइन करने से धरम के कैरियर पर बहुत घर असर पद सकता है
मेरा नाम निर्माताओं से उसका कैरियर खरीद सकता है | वाकई ” फूल और पत्थर ” ने धर्मेन्द्र का कैरियर सवार दिया | फिर मदद पर मीना जी गहरी साँसे लेती थी इसीलिए मदद करती हूँ कि इससे मेरे दिल — जज्बात को सकूं मिलता है | शुक्रिया मुझे करना चाहिए उसे |
आज मुझे किसी नये नाम या शोहरत की आवश्यकता नही जो मैं किसी से उस चीज की भीख मांगती नजर आऊ | इससे बेहतर तो मैं मदद न करना समझती हूँ |

धर्मेन्द्र ही सही पर न्यू कमर्स के लिए हमख्याल थी |
” जब बच्चा पहली बार चलना सीखता है , उसके गिरते – डगमगाते हुए कदम , किसी ऊँगली का सहारा तलाश करती है |
फिल्म इंडस्ट्रीज में आने वाला हर न्य फनकार उस बच्चे की तरह कमजोर होता है उसकी आँखे भी किसी न किसी सहारे के लिए लगातार उठती रहती है | कोई उसकी तरफ हाथ बधा देता है तब ही उसके पाँव यहाँ टिक पाते है |
हमने भी अपने जमाने में ऐसी उम्मीदे , ऐसे सहारे ऐसे मौके तलाश किये है | आज हमारे मजबूत कदमो के नीचे सहारा देने वाले हाथो की बुनियाद रखी हुई है |

एक मीना कुमारी बन जाने से इंडस्ट्रीज किसी और को मीना कुमारी बनाने से , न तो इनकार ही कर सकती है और न ही उसका रास्ता रोक सकती है |

मदद करने से किसी का मुकद्दर नही बदला जा सकता मीना जी को माल जार इलाके और जागीर की परवाह नही थी | उन्हें तो सिर्फ प्यार चाहिए था |मुहब्बत
बहार की फूलों की तरह मुझे अपने जिस्म के रोएं रोएं से
फूटती मालूम हो रही है | किरदारों के लिबास को ज्यादा से ज्यादा देर तक पहने रहने से जिन्दगी के पाँव शीशे के टुकडो से छलनी हो जाता है |चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा,
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा

बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआँ तन्हा प्यार उनके लिए जन्नत था और जन्नत के लिए मौत की तकलीफ तो उठानी ही पड़ती है |
जिसने भी उनके पास मजबूर बन के झोली फैलाया उन्होंने उसे भर दिया | चाहे क्यु न उनकी मदद को उसने एय्याशी में उड़ाया हो | जब भी परिवार वालो ने उनकी दरियादिली पर मदद का मजाक उड़ाया तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा ” मुझे मदद का कोई मलाल नही बदकिस्मती तो उसकी है लिहाजा उसे अफ़सोस करना चाहिए कि उसने ता- उम्र भर के लिए अपने एक सहारे को तोड़ दिया |
मीना ने प्यार किया हर कोई प्यार करता है पर शायद कुछ लोगो की तरह बदकिस्मत थी कि उनका प्यार पाने वालो ने उसे कबूल नही किया और उनका प्यार सरे आम नीलाम होता रहा | उनके प्यार ने उनके चेहरे पर हमेशा के लिए बदनामी का दाग लगा दिया |
काश: उनकी तकदीर ने उनके प्यार की गुलजार में बैठाया होता तो आज ब्यालिस साल पुरानी लाश को बदनामी का खौफ न होता | संगदिल जमाने ने भले ही उन पर ताने – मारे मगर उन्हें अपने प्यार पर नाज था |

दोस्त को प्यार भी किया है तो कौन सा गुनाह कर दिया है ? जरूरत के वक्त कौन किसका साथ नही चाहता ? अंधेरो ने चिरागों की तमन्ना की है , खिजा ने भारो की |

शायरों ने उनकी तमन्ना को भी सजदा किया है तो क्या एक मामूली महजबीन को उन जैसा हक नही मिल सकता ?
मीना जी का प्यार के लिए फलसफा था | उन्होंने न केवल प्यार को समझा बल्कि परिभाषित भी किया
” प्यार इंसान के जिस्म की रूह है ”
मैं सोच भी नही सकती कि एक आम इंसान बगैर रूह के , जिस्म को कैसे और कब तक ज़िंदा रख सकता है ? अगर कोई कर सकने का दावा कर भी दे तो मैं कहुगी वह अपनी लाश को रेशमी लिबास पहना कर जीने के भरम से जी बहला रहा है |

ऐसा कहा जाता है कि प्यार का उन्हें जूनून था , उनका मिजाज भी शायराना था और उन्होंने बेहतर शायरी भी की | प्यार में वे पागलपन की हद तक गुजर जाती थी |
फूल और पत्थर की सफलता के बाद धर्मेन्द्र का संदलीचेहरा फिर उनकी आँखों के सामने नही आया | वे तन्हा हो गयी — मरते दम तक ” मुहब्बत
क़ौस ए कुज़ह की तरह
क़ायनात के एक किनारे से
दूसरे किनारे तक तनी हुई है
और इसके दोनों सिरे
दर्द के अथह समुन्दर में डुबे हुए हैं —
आखरी सांस में धर्मेन्द्र की महक थी और आखरी वक्त में भी ” जैसे शाम का डूबा सूरज , सुबह फिर नई रौशनी लेकर आता है वैसे ही मेरा धरम वापस आयेगा |

मीना जी भारतीय संस्कृति की प्रतिमूर्ति थी | वात्सल्य का बहता दरिया थी | औरत के दोयम दर्जे के अस्तित्व पर उन्हें आक्रोश और अफ़सोस था | जब उनकी बदनामी उनकी आफियत का कत्ल कर देती तो उनके दिल की आँखों से आसुओ का सैलाब समन्दर में बह जाता |
क्या लोग शायरों की जुबा समझते है औरत की नही ? मीना जी का यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है | आखिर कौन देगा इसका जबाव उन्हें सभी ने तो छला उनकी निजी जिन्दगी इतनी तल्ख हो गयी कि इस सवाल का जवाब वे स्वंय तलाशने लगी |
छोटी बहु की किरदार में एक बार जो उन्होंने मय का प्याला पकड़ा तो ता- उम्र वह उनका सहारा बन गया | ” शून्य के भी आंसू आँखों से लहू बनकर टपके मीना जी नहाई | कफन में लपेटकर उनके ठंठे जिस्म को दफना दिया गया | हमेशा – हमेशा के लिए उनका जिस्म उनकी रूह और उनका प्यार एक ख़्वाब बनकर रह गया |

आगाज़ तॊ होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वॊ नाम नहीं होता

जब ज़ुल्फ़ की कालिख़ में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं हॊता

(सुनील कुमार दत्ता — स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक है ं)

” माजी और गुलजार द्वारा लिखित पुस्तक ” मीना कुमारी ” पर आधारित

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