‘मिशन मंगल ‘ फिल्म पर ज्यादातर नकारात्मक प्रतिक्रियाएं क्यों?

Cinema

-रश्मि राविजा
कुछ ने तो कहा कि फ्री में टोरेंट पर बढ़िया प्रिंट मिले तब भी मत देखो. पर मैं तो कभी किसी की सुनती नहीं, इसलिए थियेटर में देखने चली गई. पर फिल्म देखने के बाद आभास हो गया कि वे लोग ऐसा क्यूँ कह रहे थे. जिन्हें विषय पर केन्द्रित, तकनीकी रूप से उन्नत, अंग्रेजी फ़िल्में देखने की आदत होगी, उन्हें यह फिल्म बहुत निराश करेगी बल्कि एक मजाक ही लगेगी. लेकिन आमजन जो ज्यादातर मनोरंजन के लिए फ़िल्में देखते हैं, उनके लिए यह एक जरूरी फिल्म है. फिल्म को मनोरंजक बनाते हुए जरूरी जानकारी भी देने की कोशिश की गई है. ये अलग बात है कि फिल्म में बॉलीवुड मसाला डालने के चक्कर में सब घालमेल हो गया है और इसी वजह से सिनेमा के गम्भीर दर्शक चिढ गए हैं. लेकिन फिर भी लोगों तक सरल भाषा में ‘मंगल ग्रह अभियान’ की मोटी मोटी बातें पहुँचाने की कोशिश की गई है.

मंगल अभियान की सफलता पर हम सबने उस मिशन में शामिल महिलाओं की तस्वीरें लगाई थीं और गौरवान्वित भी हुए थे .यह पूरी फिल्म मंगल मिशन को सफल बनाने के उनके संघर्ष,लगन, जुनून के इर्द गिर्द बुनी गई है. 2010 में जब राकेश धवन( अक्षय कुमार) के नेतृत्व में ISRO की एक टीम रॉकेट लॉन्च करने में असफल हो जाती हैं तो उन्हें सजा के तौर पर मंगल अभियान की तैयारी के लिए भेज दिया जाता है. जिसके लिए न कोई स्पष्ट योजना है, ना बजट और ना ही अनुभवी वैज्ञानिकों की टीम उन्हें मिलती है. वैज्ञानिक तारा (विद्या बालन ) जो उस असफलता के लिए खुद को दोषी मानती हैं, राकेश धवन का पूरा साथ देती हैं. उनकी टीम में चार और महिलाएं और दो पुरुष शामिल होते हैं . सब मिलकर रोजमर्रा के जीवन की छोटी छोटी घटनाओं से प्रेरणा लेकर अभियान को सफल बनाने में जुट जाते हैं. पैसे की अतिशय कमी की वजह से खर्च कम करने के लिए कई तरह के जुगाड़ लगाए जाते हैं.(जिसमें भारतीय माहिर हैं 😊 )।टीम में महिलाएं ज्यादा हैं और महिलाएं घर चलाने के लिए कतर-ब्योन्त करना खूब जानती हैं।यही सब आइडियाज वे यहाँ भी लगाती हैं। मंगलयान को भेजने के लिए जितने ईंधन की जरूरत है,उतना ईंधन ढोने में रॉकेट असमर्थ है ।इस समस्या को हल करने का आइडिया तारा किचन से लेती हैं, जैसे तेल जब बहुत गर्म हो जाये तो थोड़ी देर के लिए गैस बंद करके भी पूरियां तल ली जाती हैं।

राकेश धवन बजट की बात पर १९६३ में पहले रॉकेट प्रक्षेपण का उदाहरण देते हैं, तब भी पैसे इतने कम थे कि रॉकेट के अलग अलग पार्ट, साइकिल पर ढो कर ले जाए गए थे . काम करने का जुनून हो तो रास्ते खुद ब खुद निकलते चले आते हैं. कई अडचनों को पार करते हुए एक हॉलीवुड फिल्म की बजट से भी कम बजट में भारत, मंगल ग्रह के ऑर्बिट में प्रथम प्रयास में ही सफलतापूर्वक सेटेलाइट भेजने वाला,पहला देश बन जाता है.

ये सारी तकनीकी बातें भी बहुत सरलता से दर्शकों तक पहुंच जाती हैं. हालांकि कुछ ऐसे दृश्य शामिल किये गए हैं जो बेवकूफी की परकाष्ठा लगते हैं, अक्षय कुमार का वैज्ञानिकों की मीटिंग के बीच में अबुल कलाम से फोन पर बात करने की एक्टिंग, सेटेलाईट से सिग्नल ना मिलने पर सारा सिस्टम बंद कर देना।

फिल्म ‘मंगल अभियान’ पर केन्द्रित है पर निर्माता-निर्देशक की रूचि फिल्म में इस अभियान से इतर वैज्ञानिकों की निजी जिंदगी दिखाने में ज्यादा है जो पूरी तरह उनकी कल्पना पर आधारित है. दर्शकों को बांधे रखने के लिए कोई मसाला छोड़ा नहीं गया, सास-बहू की नोंक-झोंक, घर-बाहर एक साथ सम्भालती सुपर वूमन, तलाक के बाद अकेली मुस्लिम लडकी को घर मिलने की परेशानी, एक आज़ाद-ख्याल लडकी का सिगरेट फूंकना और बॉयफ्रेंड बदलना, एक कुंवारे चम्पू लडके का बाबाओं के चक्कर लगाना, विदेश में बसे बेटे द्वारा बूढ़े माँ-बाप की उपेक्षा, एक आर्मी ऑफिसर का घायल होना, सब शामिल है. देशभक्ति का तड़का भी भरपूर है. पर पता नहीं एकाध जगह फूहड़ हास्य भी शामिल करने की क्या मजबूरी थी.

फिल्म में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका विद्या बालन की है, जो उन्होंने एक गृहणी, टीनएजर बच्चों की माँ और एक कामयाब वैज्ञानिक के रूप में बखूबी निभाई है. अक्षय कुमार कभी कभी कुछ ज्यादा ही नाटकीट लगते हैं. शरमन जोशी, थ्री इडियट्स के बाद से ही चम्पू लडके के रोल में टाइप्ड हो गए हैं पर अभिनय सहज ही था . सभी कलाकारों ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया.

गीत-संगीत की गुंजाइश इस फिल्म में नहीं थी फिर भी डिस्को का एक लचर सा निरर्थक दृश्य रचा गया है.
छायांकन बहुत सुंदर है।

बहुत सारी कमियों के बावजूद यह फिल्म देखी जानी चाहिए. जिन लोगों ने विस्तार से मंगलयान के अभियान के विषय में नहीं पढ़ा, शायद उनकी रूचि जागेगी . फिल्म में दी गई थोड़ी सी जानकारी से उनका मन नहीं भरेगा वे सब कुछ जानना चाहेंगे, और इसके विषय में ढूंढ कर पढ़ेंगे। क्या पता किसी बच्चे के मन मे वैज्ञानिक बनने का सपना पलने लगे और वो पढाई में मन लगाए ( हो सकता है ये उम्मीद कुछ ज्यादा लगे पर उम्मीद ही तो है )

एक उम्मीद के सहारे ही इसरो के सत्रह हज़ार वैज्ञानिकों ने अथक प्रयास और कड़ी मेहनत से यह असंभव सा दिखता अभियान सफल कर दिखाया।

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