‘मधुमास का समय’

Literature Uttar Pradesh

अरविन्द कुमार सिंह
सौन्दर्य में चुम्बकीय आर्कषण होता है। यह आकर्षण प्रकृति के रोम-रोम में सुवासित होता है। प्रकृति भी श्रृगांर करती है और साज श्रृगांर से नौहढ़ दुल्हन की तरह संवर जाती है। सौन्दर्य की देवी ‘रति’ और ‘कामदेव’ का मधुर मिलन ‘ऋतुराज’ बसंत के आगमन का प्रतीक है। प्रकृति स्वयं सौन्दर्य की याचक, साधक, सर्जक और विनाशक है। प्रकृतिजीवी, प्रकृति के इस सौन्दर्य अनुभूति का ‘रसपान’ करते हैं। पतझड़ के द्वारा वह अपने पुरातन आवरण को त्यागकर नूतन को धारण करती है। पुरानी ऊर्जा का, नवीन ऊर्जा मंे रुपान्तरण होता है। सम्पूर्ण धरा-धाम सकारात्मक ऊर्जा के इस अनुभूतिजन्य परिवर्तन का साक्षी और साधक बनती है। यह सकारात्मक ऊर्जा का निरन्तर ‘प्रवाह’ प्रकृति के रोम-रोम से होता है। वृक्षों की डालियों पर नई-नई कोपलें, आमों के बौरे, खेतों में खिली पीली सरसों के पुष्पदल, परिवेश में तैरती मादक गंध इस पूरे माह को ‘मधुमास’ बना देती है। इस ‘मधुमास’ में कामदेव और सौन्दर्य की देवी ‘रति’ का मधुर मिलन प्रकृति के ‘अद्वितीय सौन्दर्य’ के प्रस्फुटन का आधार बनती है। यूँ कहें तो एक नये सृजन की शुरुआत होती है।
आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार सृजन और विध्वंश साथ-साथ चलने वाली एक शाश्वत प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया प्रकृति द्वारा ही रचित नियंत्रित और संचालित होती है। प्रकृति जब अपनी पुरातन केचुल को उतार उसका विध्वंश करती है तो प्रकृति ही उस विध्वंश को नया आवरण देकर सृजन में बदल देती है। भगवान श्रीकृष्ण भी इस ऋतुराज का बखान करते हुये युद्धभूमि में गीता का ज्ञान देते हैं, ‘‘मैं ऋतुओं में ऋतुराज बसंत हूँ’’। देश भक्त भी देश की राष्ट्रीयता की रक्षा के लिए कहता है ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’। अर्थात यह ऋतुराज केवल प्रकृति का ही रंग-रोगन नहीं करता बल्कि इस धरा-धाम पर निवास करने वाले समस्त प्राणियों का तन और मन दोनों रंग देता है। यह सभी का चोला (शरीर) और मन (आत्मा) को अपने रंग में रंगकर उसका परिष्कार कर देती है।
प्राचीन उत्सव धर्मी इस महादेश में ‘मदनोत्सव’ और ‘बसंतउत्सव’ मनाने की परम्परा थी, तो आज के दौर इस माह में होली, बसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, नवरात्रि जैसे त्यौहार इस प्रकृतिजीवी समाज के मानस और हृदय में मनता है। बसंत एक राग है। बसंत एक फाग है। यह एक विचार है और सौन्दर्य अर्चन करने उसको धारण करने का दर्शन है। यूँ कहें कि इस लौकिक जीवन-दर्शन की सकारात्मक संजीवनी है।
राग-विराग से मुक्त होेकर जीवन के दर्शन और ‘यर्थाथ बोध’ का साक्षात्कार करने का यह काल का विशेष प्रवाह है। महेश (भगवान शंकर) का पार्वती (शक्ति) से मिलन ‘शिवरात्रि’ भी इसी ‘मधुमास’ में होती है। कटुता और विराग से मुक्त होकर रंग गुलाल से भीगता मानस, समस्त बुराईयों को छोड़कर आपस में होली के रंग में रंग जाता है। विद्या की अराध्य देवी सरस्वती का पूजा-अर्चन बसंत पंचमी भी इसी मास का विशेषण है।
अर्थात ‘मदनोत्सव’ नकारात्मक का सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तन और बदलाव का समय है। सभी जड़ताओं और पुरातन विचारों में सकारात्मक नवीनता का समय जीवन उमंग और उत्साह से भरने का समय, कुछ नया रचने और करने का समय, प्रकृति के सामीप्य और समर्पण का समय!

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