भारत छोड़ो आंदोलन में काशी की पत्रकारिता

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-KDN Rai

स्वतन्त्रता आंदोलन में पत्रकारिता जनमानस को दृष्टि, दिशा और शक्ति प्रदान करती थी। स्वतन्त्रता आंदोलन के प्रायः सभी बड़े नेताओं के अपने पत्र थे और पत्रकारिता के माध्यम से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जनमत तैयार किया जाता था। सत्ता की चाटुकारिता करने वाले तब भी थे। जो नही थे, उनके अखबार बन्द हो गये।
यह बात गुरुवार को काशी पत्रकार संघ के तत्वावधान में आयोजित ‘भारत छोड़ो आंदोलन में काशी की पत्रकारिता’ विषयक संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि जेएनयू के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर आनंद कुमार ने कही। उन्होंने कहा कि उस दौर में राजनीति हो या पत्रकारिता झूठ को सम्मान नही मिलता था । बाबू शिव प्रसाद गुप्त और बाबू राव विष्णु पराड़कर के अंशदान की चर्चा करतें हुए उन्होंने कहा कि ‘आज’ का प्रकाशन ही स्वतन्त्रता आंदोलन को बल प्रदान करने के लिए किया गया था । मौजूदा पत्रकारिता पर चर्चा करते हुए प्रोफेसर आनन्द ने कहा कि तब किसी के चेहरे पर किसी और का धड़ जोड़ने वाली पत्रकारिता नही होती थी। जेएनयू की घटना को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि वह एकदम गलत बात थी।
उस दौर में देश के हजारों स्वतंतता सेनानियों का बनारस आना जाना लगा रहता था। केवल पत्रकारिता ही नही समाज के हर तबके का सहयोग आन्दोलनकारियों को मिलता रहा। प्रमुख समाजवादी विजय नारायण ने कहा कि ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ जनमानस तैयार करने में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनका मानना है कि अबकी पत्रकारिता मे भी लोगों का भरोसा बना हुआ है। इस अवसर पर काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष संजय अस्थाना, वरिष्ठ पत्रकार सुफल कुमार, सुरेश प्रताप आदि ने भी विचार रखे। अध्यक्ष राजनाथ तिवारी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की जबकि महामंत्री मनोज ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन प्रदीप कुमार ने किया ।


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