भारतीय हिन्दी सिनेमा-कल से आज तक

Cinema Entertainment Uttar Pradesh

राज कुमार सिंह


भारतीय सिनेेमा के जनक कहे जाने वाले दादा साहेब फाल्के ने ‘‘राजा हरिश्चन्द्र’’ फिल्म बनाकर भारतीय फिल्मों की शुरुआत की सन् 1913 में जो मूक फिल्म थी। मूक फिल्मों से शुरु होकर आज सिनेमा कितना समृद्ध हो चुका है उसके बारे में जितनी चर्चा की जाये उतना ही कम है। सन् 1913 से भारतीय सिनेमा ने अपना वर्चस्व 1930 तक आते-आते हर वर्ष लगभग 200 फिल्में बनाने लगीं। जो फिल्मोद्योग का एक वृहत रुप ले चुकी थी। तकनीकि विकास और फिल्मकारों की सोच, उसमें पूर्णतया खुद को समाहित करने बेचैनी, सब कुछ दिखने लगी। भारतीय फिल्में स्वंय को दर्शाने लगी, समाज का दर्पण बन गयीं, समाज की सच्चाई को सामने लाने का माध्यम बन गयीं। प्रेम, प्यार और परिवार को दर्शाने के साथ-साथ समाज में व्याप्त बुराईयों को उजागर किया जाने लगा। जड़ता, रुढ़िवादिता और जातिवाद पर सीधा प्रहार किया गया।
सन् 1931 में आदेशीर ईरानी ने पहली बोलती फिल्म ‘‘आलम आरा’’ का निर्माण कर इतिहास रचा, जिसकी नायिका थीं जुबैदा। इसफिल्म ने लोगों को व्यापारिक स्तर पर समृद्ध बना दिया। टाॅकीज और संगीत का एक बडा बाजार उभर कर सामने आया। जो क्रांति का दौरा था। हिन्दी फिल्मोद्योग और प्रादेशिक भाषा फिल्मोद्योग ने तुरन्त बोलती फिल्में बनाने की ओर रुख किया। परन्तु 1930 से 1940 तक का वक्त भारतीय फिल्मोंद्योग के लिए बहुत बुरा रहा। माहौल बिगड़ चुका था। चाहकर भी विकास नही कर सकते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध, भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन, बटंवारे की हिंसा, परन्तु तब भी कुछ फिल्मकार थे जिन्होंने सामाजिक मूल्यों को और भारत की स्वतंत्रता को मुद्दा बनाकर अपनी फिल्में बनाते रहे जिसने हिन्दुस्तानियों के दिलों में जोश पैदा कर दिया। उसके बाद 1937 में ‘‘आलमआरा’’ के निर्माता आर्देशीर ईरानी ने रंगीन फिल्मों की ओर रुख किया और पहली रंगीन फिल्म ‘‘किसान कन्या बनाई, फिर दूसरे ही वर्ष बनाई ‘‘मदर इंडिया’’ परन्तु रंगीन फिल्में उतनी प्रचलित नही हुई। 1947 में चेतन आनन्द की नीचा नगर आयी। सन् 1950 के अन्त तक प्रेम ड्रामा उक्शन ने सिनेमा में अपनी घुसपैठ बना ली थी।
उसके बाद भारतीय फिल्मोद्योग के लिए जो दौर आया वह उसके लिए सुनहरा दौर था। वह था सन् 1950 से 1960 का दौर। इस दौर में तमाम प्रतिभाशाली निर्माता-निदेशक और नायक-नायिका उभरकर सामने आये। उसी समय एक फिल्मकार, अभिनेता, निदेशक सामने उभरकर आया जिसने करोड़ों दिलों पर राज किया। नाम था ‘‘राजकपूर’’ जिसका सहज अंदाजा, दिल को छू लेने वार्ला अिभनय भाव-विभोर कर देता था। नीली आँखों के इस जादूगर ने सन् 1951 में ‘‘आवारा’’ बनकर लोगों के सामने आये तो 1955 में ‘‘श्री 420’’। राजकपूर अपनी अदायगी, भोलेपन से लोगों के दिलों को लूट गये। लोगों का आइना बन गये; लोग खुद को उनके जैसा महसूस करने लग गये और यही राजकपूर को मील का पत्थर साबित कर गयी। ‘‘मेरा नाम जोकर’’, ‘‘जागते रहो’’ ने लोगों को हंसाया रुलाया। उनके चाहने वाले भारत में ही नही वरन विदेश में भी थे।1957 में गुरुदत्त की प्यासा और 1959 में कागज के फूल आयी। 1957 में ही महबूब खान की इन्डिया आयी जो बेस्ट विदेशी भाषा की फिल्म के लिए एकेडमी अवार्ड के लिए चुनी गयी थी। विमल राय की मधुमती। ‘‘दो बीघा जमीन’’ ने एक सशक्त कलाकार दिया वो थे बलराज साहनी। उन्होंने वास्तविकता लाने के लिए जोगेश्वरी के दूधवालों की बस्ती में जाना शुरु कर दिये। कलकत्ता में शूटिंग के दौरान एक रिक्शे वाले को फिल्म की कहानी सुनाये तो वह रो पड़ा बोला-ये तो मेरी कहानी है। ‘‘गरम हवा’’ में बलराज साहनी का अभिनय कालजयी माना जाता है। बलराज साहनी के लिए अभिनय जीवन का हिस्सा था। उनकी पहली फिल्म ‘‘धरती केे लाल’’ इप्टा के साथियों की सामूहिक मेहनत थी।
हिन्दी सिनेमा के मुख्यधारा के फिल्मकारों और नायक-नायिकाओं में प्रमुख रुप से कमाल अमरोही, विजय भट्ट, देव आनन्द, दिलीप कुमार, राजकपूर, मनोज कुमार, गुरुदत्त, शशी कपूर, अशोक कुमार, भारत-भूषण, नायिकाओं में-नरगिस, बैजन्ती माला, श्यामा, नादिरा, कल्पना कार्तिक, मीना कुमारी, नूतन, मधुबाला, वहीदा रहमान, आशा पारिख, माला सिन्हा, सुलोचना ने करोड़ो दिलों पर राज किया और बहुत से कलाकार फिल्म जगत में अपना योगदान देते रहे। हिन्दी सिनेमा के साथ-साथ बंगाली सिनेमा भी समृद्ध होता रहा और समाज को नई दिशा प्रदान करता रहा। जहां एक ओर व्यवसायिक सिनेमा ने अपनी जड़े फैलाई तो दूसरी ओर आंदोलनकारी नई सोच के फिल्मकारों ने अपनी बात का लोहा मनवाया। एक अलग अंदाज में अपनी फिल्मांेे को सजाया संवारा और सोते दर्शकों, समाज को जगाया कि ऐसा भी होता है। कुछ फिल्मकार ऐसे हुए जिन्होंने भारत ही नही वरन् विदेशों में अपने नाम का डंका बजवाया। उनमें मणिकौल, बलराज साहनी, दीपा मेहता, श्याम बेनेगल, केतन मेहता, गोविन्द निहलानी, विजया मेहता प्रमुख थे। कुद फिल्मों के बारे में बार-बार लिखा गया, बार-बार चर्चा का विषय बनीं जिसमें गुरुदत्त की ‘‘प्यासा’’, ‘‘कागज के फूल’’ राजकपूर की ‘‘आवारा’’ विजय भट्ट की ‘‘बैजू बावरा’’ मेहबूब खान की ‘‘मदर इंडिया’’ के आसिफ की ‘‘मुगले आजम’’ जिसने पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार, मधुबाला का अमर कर दिया। उसके बाद शुरु होता है आधुनिक सिनेमा का दौर सन् 1960 से 1970 के बीच का। यह दौर था रोमांस और एक्शन का, मधुर संगीत का। जो दौर था अच्छी कहानियों का, जो दौर था फिल्म को नये अन्दाज में पेश करने का, जो दौर था फेशन का, जो दौर था नायक-नायिकाओं की अदाओं का जिन पर लोेग मर मिटते थे। उनके जैसा दिखने को बेसब्र हुआ करते थे। ऐसे दिवाने हुआ करते थे जो नायकों का चलना, बोलना, पहनावा उनकी हर चीज को खुद में पाना चाहते थे। इस दौर के अभिनेताओं में राजेश खन्ना, धर्मेंन्द्र, संजीव कुमार, शशी कपूर, दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, देवानन्द, संजय खान, फिरोज खान, राजेन्द्र कुमार ने अपना योगदान दिया। बंगाली फिल्मों के उत्तम कुमार ने अमानुष में अभिनय कर सभी के दिलों में घर बनाया। राजेश खन्ना ने नया कीर्तिमान रचा सुपर स्टार होने का और वहीं अमिताभ ने उसे आगे बढ़ाकर दूसरे सुपर स्टार की पदवी हासिल की परन्तु उसके बाद कोई सुपर स्टार नही बन सका। आज अमिताभ एक हस्ती हैं उनके जैसा दूसरा कोई नही है।
सन् 1970 से 1980 का दौर फिल्मोद्योग की व्यवसायिकता का दौर था। 1975 में दो फिल्में आयीं ‘‘शोले’’ और ‘‘जय संतोषी माता’’ जिसने नया कीर्तिमान स्ािापित किया। दीवार आयी तो यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित और सलीम जावेद द्वारा लिखित थी हाजी मस्तान की जिन्दगी पर आधारित इस फिल्म को अमिताभ बच्चन ने अभिनीत किया था। बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित ‘‘रजनीगंधा’’ थी जिसने विद्या सिन्हा जैसी समर्थ अभिनेत्री दिया। रीना राय, जरीना बहाव, शबाना आजमी ने जो योगदान दिया फिल्म जगत को दिया है वह सर्वविदित है।
उसके बाद कारवां आगे बढ़ता रहा और वास्तविकता को चित्रित करते हुए समानान्तर सिनेमा को आगे बढ़ाया श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, विजया मेहता, कुमार साहनी, मणीकौल आदि ने आगे विस्तारित किया दीपा मेहता, मीरा नायर ने जिनकी फिल्म सलाम बाम्बे को 1988 में कानॅ फिल्म महोत्सव में नामांकित किया गया। मिला जुला दौर जो लोगों को जगाता रहा, लुभाता रहा, गुदगुदाता रहा।
अब आया परिवार केन्द्रित संगीतमय, प्यार में सराबोर फिल्मों का दौर। प्यार जो लोगों के दिलों को छेड़ गया और एक नया रोमांच भर गया। 1988 में आयी ‘‘कमायत से कयामत तक’’ 1989 में आयी ‘‘मैने प्यार किया’’ जिसने व्यावसाय के सारे रिकार्ड तोड़ दिये और सलमान खान को स्थापित कर गयी। सलमान को ‘‘किक’’ तो पहले ही मिल चुकी थी पर दिखाया अब। फिर सूरज बड़जात्या ने ‘‘हम आप के हैं कौन बनाई’’ जो सुपर-डुपर हिट रही, शाहरुख, काजोल अभिनीत ‘‘दिल वाले दुल्हनिया ले जायेगें’ संगीतमय फिल्मों को एक ऊँचाई प्रदान कर गयी। इस दौर के अभिनेता, अभिनेत्रियों में श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, जुही चावला, काजोल, आमिर खान, सलमान खान, शाहरुख खान, फरदीन, गोविन्दा पूजा भट्ट, करिश्मा कपूर, करीना, रबीना टण्डन, अक्षय कुमार, मिथुन, ट्विन्कल खन्ना, बाबी, सन्नी नये दौर में दीपिका पादुकोन, विपासा, कैटरीना, फरहान अख्तर, रणवीर कपूर, सिद्धार्थ मल्होत्रा, वरुण धवन, रणवीर सिंह, अनुष्का शर्मा, आलिया भट्ट ऐश्वर्या राय, अभिषेक। फिल्मों में लगान, देवदास, कोई मिल गया बहुत सारी फिल्में जिसने इस दौर को सवांरा है। आज फिल्मोद्योग बहुत ही समृद्धशाली है। अपनी कला से, अपनी प्रतिभा से, पैसे से, कलाकारों से, तकनीकि से।आज भारतीय सिनेमा अबाध गति से बढ़ रहा है। जिसने विश्व में अपना मुकाम हासिल का लिया है। संगीत तो फिल्मों का अभिन्न अंग रहा है फिल्मों के शुरुआती दौर से ही इस पर विशेष ध्यान दिया गया और मधुर, कर्णप्रिय गीत-संगीत की रचना हुई। पर आज के दौर में एक से एक नया संगीत आ रहा है, प्रयोग पर प्रयोग हो रहे हैं। खुला आसमान है। फिल्मों का बिना रोक-टोक सभी बातें खुल के कहीं जा रही हैं। पर लगाम तो आवश्यक है जो समाज को सही दिशा प्रदान करें क्योंकि फिल्में  हमारे समाज का आइना है। भारतीय सिनेेमा अपने चर्माेत्कर्ष पर है जिसकी रोशनी चारो ओर फैल रही है।

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