फिर भी हो ही गया प्रेम…

Literature

– Minakshi Vashishtha

मुझे सिखाया गया बुरी बला है प्रेम
कभी नहीं करना।
बताया गया, प्रेम में पड़ती हैं
बदचलन लड़कियाँ।
भली लड़कियाँ…
कभी नहीं करतीं प्रेम।
फिर मुझे सिखाया गया
अपने चारों ओर नागफनी की क्यारियाँ लगाना
कि तुम्हारे आस-पास आते ही
घायल हो भाग जाए ‘प्रेम’ ।

पहले बनाई गई मेरे चारों ओर
ऊँची मज़बूत नुकीली चाहरदीवारी
फिर उगाया गया मेरे आस-पास
नागफनी का घेरा।

मैं भी निश्चिंत हो गई
मुझ तक पहुँचने की जुगत में
भला क्यों घायल होना चाहेगा
किसी का प्रेम
ये नुकीला, डरावना सुरक्षा कवच
बचा ही लेगा मुझे…!

हाय! बड़ा शातिर निकला तुम्हारा प्रेम
जाने किस चोर रास्ते से हो आ गया
मेरे अन्दर
इस सफ़र में जाने कितने घाव सहे होंगे उसने
और आख़िर तुम उग ही आये मेरे अन्दर
हर दिन होता ही जा रहा है
तुम्हारा विस्तार
तुम्हारी जड़ों ने जकड़ ली
मेरे मन की मिट्टी।

मेरे हँसने से झरते हैं जो फूल
डरती हूँ कहीं सारी दुनिया ना ढँक जाए उन हारसिंगारों से….!
तुम्हारे मुस्कुराने से भी
बिखरते हैं इतने रंग…..
अंतरिक्ष से भी ये पृथ्वी
बहुरंगी दिखने लगी है।

मेरे ईश्वर मुझे माफ़ करना
मैंने बचने की लाख कोशिश की….
फिर भी हो ही गया प्रेम।

(मीनाक्षी वशिष्ठ के पहले कविता संग्रह ‘क्या बोलेंगे चार लोग’ से)
प्रकाशक : रश्मि प्रकाशन लखनऊ

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