देवदार के घने जंगल का वह भुतहा बंगला !

Differentiator India News

अंबरीश कुमार
बस से उतरे तो शाम भीगी हुई थी .सामने देवदार के दरख्तों से घिरी कोई इमारत थी .यह कोई बस अड्डा जैसी जगह भी नहीं थी .अपने को जाना डाक बंगला तक था .पर जंगल के साथ साथ जा रही सड़क सुनसान थी .इधर उधर देखा तो कुछ दूर पर एक बुजुर्ग दिखे .उनसे पूछा कि डाक बंगला किधर है तो जवाब दिया ,इसी सड़क पर करीब एक किलोमीटर चले जायें एक ही भवन दाहिने तरफ दिखेगा वही डाक बंगला है . ठंढ भी बढ़ रही थी और अंधेरा भी घिर रहा था .डर बरसात का था क्योंकि छाता तो लेकर आये ही नहीं थे .चकराता बस से गए थे और ज्यादा जानकारी नहीं थी .रास्ता पूछते पूछते डाक बंगला की तरफ चले तो घने देवदार की जंगलों में एक किलोमीटर से भी ज्यादा चलने पर एक पुराना बंगला नजर आया जो बंद था .बरामदे की कुर्सियों पर बैठे तभी एक बुजुर्ग सामने आए जो उसके चौकीदार और खानसामा सभी थे .खैर चाय और रात के खाने के बारे में पूछा तो जवाब मिला ,बाजार से सामान लाना होगा तभी कुछ बन पाएगा और बाजार बंद होने वाला है .

नब्बे के दशक की शुरुआत थी .घूमने फिरने के शौक के चलते चकराता का कार्यक्रम बना .जनसत्ता की नौकरी में घूमना फिरना काफी होता था .चकराता एक अछूती सी जगह थी तो सोचा घूमने के साथ एक यात्रा वृतांत भी लिख दिया जाएगा .जनसत्ता ब्यूरो के साथी अनिल बंसल अक्सर कहते थे कि मै जहां भी घूमने जाता हूं लौटकर उसके बारे में रविवारी जनसत्ता में लिख कर यात्रा का पैसा भी वसूल लेता हूं .कुछ हद तक यह सही माना जा सकता है क्योंकि यात्रा में बहुत ज्यादा खर्च न हो इसलिए डाक बंगला में ज्यादा रुकना होता था .चकराता में रुकने के लिए तब परमिट की जरुरत पड़ती .हरिद्वार स्थित अपने संवाददाता सुनील दत पांडेय ने परमिट वगैरह बनवा दिया क्योकि सारा इलाका सेना के अधीन है . पर यहां आने जाने का कोई साधन नहीं था .पैदल ही चलना पड़ा .चकराता का रास्ता तब वन वे था और कई जगह खाई देख दर भी लगता था .खैर शाम को पहुंचे तो देवदार के घने जंगल ,बर्फ से लड़ी पहाड़ियों को देख सम्मोहित थे .हरियाली ऎसी की आखे बंद होने का नाम न ले .यहाँ से शिमला का भी रास्ता है और बहुत ज्यादा दूर भी नहीं है .चकराता में तब कोई आबादी नहीं थी और न ही कोई होटल क्योकि यह इलाका सेना के अधीन है और कोई निर्माण नहीं हो सकता था .आवाज के नाम पर हवाओं से हिलते दरख्त के पत्तों की आवाज या फिर सड़क पर परेड करते सैनिकों के बूटों की आवाज .रात के अंधेरे में यह सन्नाटा डराता भी था .खैर हम डाक बंगला तक पहुंच ही गए .
नाम नहीं याद पर चौकीदार ने डाक बंगले का एक सूट खोल दिया जो ठंडा और सीलन भरा था जिसके कोने में बने फायर प्लेस में रखी लकड़ी को जलाने के साथ मेरे और सविता के लिए दो कप दार्जलिंग वाली चाय भी ले आया तो कुछ रहत मिली .ठंड और बढ़ गई थी . बाहर बरसात और धुंध से ज्यादा दूर दिख भी नहीं रहा था .यह डाक बंगला अंग्रेजों के ज़माने का था जिसका एक हिस्सा स्कूल में तब्दील हो चुका था .बाद में चौकीदार ने बताया वह भी उसी दौर से यहाँ पर है और जब राजीव गांधी देहरादून में पढ़ते थे तो छुट्टियों में यही आते और रुकते थे .डाक बंगले में बिजली नहीं थी और एक पुराने लैम्प की रौशनी में खाना खाते हुए चौकीदार से कुछ पुराने किस्से सुन रहे थे .और उस वीराने में कुछ था भी नहीं बाहर बरसात के चलते अगर निकलते भी तो घना अंधेरा .तेज हवा के साथ बरसात की तेज बूंदे टिन की छत पर गिरकर कर्कश आवाज कर रही थी .कमरे के भीतर एक कोने में भी पानी की बूंदे अपना रास्ता तलाश रही थी .चौकीदार ने भी कुछ ऐसे किस्से सुनाये कि उत्सुकता और बढ़ गई .जंगलात विभाग के डीएफओ का जो बंगला है उसमें किसी अंग्रेज अफसर की आत्मा भटकती है .इस वजह से कई अफसर उस बंगले को छोड़ गए .वैसे भी आसपास का माहौल बहुत ही रहस्नय मजर आ रहा था .ऐसे में भूत प्रेत के किस्से और डरा ही देते हैं

.यह फोटो भुतहे बंगले की

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