‘ठेठ हिंदी का ठाट’ में जीवन मर्म

Literature Uttar Pradesh

डॉ. चंदन कुमारी


पौराणिक नदी ‘तमसा’ से तीन ओर से घिरे आजमगढ़ के निजामाबाद कस्बे में 15-04-1865 ई. को कवि सम्राट “अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’” का जन्म हुआ। हिंदी साहित्य जगत को इन्होने खड़ी बोली हिंदी का प्रथम महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ दिया जो आज भी मील का पत्थर है। हिंदी साधक ‘हरिऔध’ जी ने हिंदी साहित्य की विविध विधाओं (कविता, नाटक, आलोचना, उपन्यास, पत्र, आत्मकथा) में अपनी लेखनी चलायी। उनकी कुछ रचनाएँ हैं -प्रिय प्रवास (1914), वैदेही वनवास (1940), पारिजात, प्रेम पुष्पोपहार (1904), फूल पत्ते, कल्पलता, चोखे चैपदे (1932), चुभते चैपदे, हरिऔध सतसई, प्रद्युम्न विजय व्यायोग (1893), श्री रूक्मिणीरमणो विजयते (1894), भाषा की परिभाषा, रस कलश, प्रेमकांता (1894), ठेठ हिंदी का ठाट (1899), अधखिला फूल (1907) इत्यादि। 16-03-1947 ई. उनकी स्वर्गप्रयाण तिथि है। निजामाबाद में एक गुरुद्वारा चरणपादुका साहब है जो कवि के घर के करीब है। स्थानीय लोगों के अनुसार कवि अपना अधिकतर सृजन वहीं बैठकर किया करते थे। इस गुरुद्वारे में गुरुनानक देव एवं गुरु तेगबहादुर का आगमन हुआ था। आज भी उनके खडाऊं सहित श्री गुरु ग्रंथसाहब की कुछ हस्तलिखित प्रतियाँ दर्शनार्थियों के लाभार्थ यहाँ संरक्षित है।
पौराणिक विषयों के साथ ही प्रखर सामाजिक चेतना संपन्न इनके सृजन कार्य में लौकिक और अलौकिक का सामंजस्य है, मानवता का विराट भाव है और लोक से गहरा जुड़ाव है। आचार-विचार, भाषा-शैली हर स्तर पर लोक का पुट इनकी रचना में देखने को मिलता है। विवेच्य उपन्यास ‘ठेठ हिंदी का ठाट’ भी इसका अपवाद नहीं है। इसमें प्रयुक्त लोक से जुड़े शब्द यहाँ देखें, -‘सिरखप, टहुलनी, तिरिया हठ, मानुख, बाट, बयार, बेर, अगोर, सरग, अटक, जोग’ इत्यादि परिस्थिति के अनुकूल भाव प्रतिष्ठापन और उसकी तीव्रता को तेज करते जीवंत साकार हो उठने वाले प्राकृतिक दृश्य इनके साहित्य का अभिन्न अंग रहा है।
सामाजिक संरचना के मध्य संबंधों की छिपी-छिपी सी मन मसोसती हुई सच्चाई और एकदम उघड़े स्वरूप में प्रकट होती जीवन की वीभत्सताऔर रुग्णता जिसका जड़ उस कथित प्रतिष्ठा की संरचना के निर्बाध और अपरिवर्तित निर्वाह के मोह में ही निहित है- इस तथ्य से साक्षात कराता हुआ उपन्यास है “ठेठ हिंदी का ठाट”। एक ओर किशोरवय की कोमल भावनाएं और दूसरी ओर उन कोमल किशोरों के मन में सामाजिक भावना के प्रति सम्मान का भाव कैसे उजागर हो रहा है देवबाला और देवनंदन की आपसी बातों से, देखें –
“क्या मैं जो थोड़ी बेर और न आता, तो तू यहाँ से चली जाती ?” “हाँ भाई ! क्या करती, अंधेरा होने पर यहाँ ठहर तो नहीं सकती, माँ जो कुढ़ने लगती है। ”(पहला ठाट)
प्रियतम और प्रेयसी का ऐकान्तिक क्षण जहाँ परस्पर मनोभावों को बिना प्रकट शब्दों के समझ लेना, जान-बूझ कर अनजान बनना और फिर परस्पर रूठना-मनाना-विहँसना चलता रहता है, देवबाला और देवनंदन के आपसी बातचीत के क्रम में यह प्रसंग भी अनुभवगम्य है। देखें- “यह माला तुमने क्यों बनाई है देवबाला ? क्या तुम हमारे जी की बात नहीं जानते, जो नहीं जानते तो हमसे मिलने के लिए यहाँ कैसे आया करते हो।” (वही)
जब एक निहायत ही निठल्ले, अनपढ़ और बिगरैल युवक रमानाथ के साथ देवबाला का ब्याह ठीक हो जाता है तब की उनकी अपनी आखिरी मुलाकात भी रोष, उग्रता और हताशारहित है। प्रेम बना रहे की एक आसा और मर्यादा की सीमा के न टूटने का पूरा भरोसा लिए देवनंदन देवबाला के हमेशा खुश रहने की कामना करता है और कहता है,“क्या मानुख के लिए निरास होने से किसी आस का होना अच्छा नहीं है ? क्या अपने बड़ों की मरजादा हम लोग बिगाड़ सकते हैं ? कभी नहीं !!!”(चैथा ठाट)
देवबाला की माँ हेमलता सामाजिक रीति-रिवाज जानती थी फिर भी उसे इनके प्रेम से ऐतराज न था। वह इन्हें एक देखना चाहती थी। “वह जानती थी ग्यारह बरस की लड़की का चैदह-पन्द्रह बरस के पराये लड़के के साथ मेल-जोल भले मानसों की चाल नहीं है। पर जो बात उसके जी में थी, उससे वह उन दोनों के आपस के नेह में कोई बुराई न समझती। (दूसरा ठाट)
अपना मन पूरा करने के लिए उसने अपने पति के साथ बेटी के ब्याह की चर्चा छेड़ी भी जिसके प्रत्युत्तर में “रमाकांत ने कहा – “यह बात मेरे जी में भी बहुत दिनों से समाई है, मैं भी इस बरस उसका ब्याह कर देना चाहता हूँ, पर क्या करूँ कहीं जोग घर बर नहीं मिलता, एक ठौर ब्याह ठीक भी हुआ है,तो वह पांच सौ रोक मांगते हैं, इसी से कुछ अटक है, नहीं तो इस बरस ब्याह होने में और कोई झंझट नहीं है। ””(वही)। जब हेमलता ने बिना कौड़ी लिए शादी करने वाले वर पक्ष सदाशिव मिसिर (देवनंदन के पिता) का नाम लिया तब जवाब मिला, “ देवनंदन का बाप धनी है। वह पढने लिखने में अच्छा है पर हाड़ में तो अच्छा नहीं है द्यउसके घर की लड़की का ब्याह मेरे यहाँ हो सकता है, मेरे घर की लड़की उसके यहाँ नहीं दी जा सकती। वह जात में मुझ से उतर कर है। (वही)। जातिप्रथा, दहेजप्रथा और पितृसत्तात्मक प्रतिष्ठा का झूठा दंभ- तीनों साथ मिलकर एक कोमल कन्या को निगलने वाला अजगर साबित हो रहा है। ऐसी व्यवस्था में विवाह वेदी स्त्री के लिए तो बलि वेदी सी है। ऐसा प्रतीत होता है मानो परिवार के लिए स्त्री उनके झूठे दंभ और अभिमान के पोषण का एक जरिया भर है। सब बूझती हुई भी स्त्री प्रतिकार नहीं करती। वह स्वीकारती जाती है, निबाहती जाती है अपने कुल और अपनेपन की मर्यादा …इन सबमें संभवतः कभी अपने अस्तित्व का अहसास भी वह भूल जाती हो तो क्या अचरज है ! इस नारीत्व की मर्यादा निबाहती देवबाला का मानसिक उहापोह देखें, “मैं दूसरे की तिरिया होकर दूसरे किसी की सुरत कैसे कर रही हूँ ! क्या यह पाप नहीं है। बाम्हन की लडकी होकर हेमलता की कोख में जनम लेकर, हिन्दुनारी की मरजादा को जान कार, हिंदुस्तान के पौन पानी से पलकर, बड़े घर की बहू बेटी कहलाकर, जो दुसरे पुरुख की पर्छान्ही भी मेरे कलेजे में धंसती हैय झलक भी आँखों में समाती है, तो क्या यह डूब मरने की बात नहीं है ! आग में जल जाने की बात नहीं है ! पहाड़ से गिरकर काया के चूर-चूर कर देने की बात नहीं है !!! छीः !छीः !!छीः !!!… बाप भाई की सुरत करना,… कैसे पाप होगा ?”(पांचवां ठाट)
पितृसत्ता के मद में पिता के समक्ष बेटी के भविष्य और पत्नी की बुद्धिमत्ता दोनों ही बौनी साबित हुई और वरपक्ष के समक्ष वही वधूपक्ष वाला पिता खुद को ठिगना महसूस करता है जब उसकी खुशी के विरुद्ध बिना गौना कराए शादी के तीसरे ही दिन देवबाला को उसके ससुराल वाले विदा करा ले जाते हैं।
ससुराल में कुलरीति से सास अपनी नई नवेली बहु का स्वागत करती है। बहु के आगमन की खुशी में स्वागत के गीत गाए जाते हैं। हँसी-खुशी के चकाचक माहौल में चाँद-सी बहु का चेहरा देखते ही फुसफुसाहट शुरू होती है। कुछ औरतें कहती हैं, “रमानाथ की उस जनम की अच्छी रही है, जो उसको ऐसी सुघर घरनी मिली है। ..जीजी दुल्हिन के मुंह जोग बार नहीं है। रमानाथ तो उस के पांवों का धोअन भी नहीं है। ”(पांचवां ठाट)
क्षण भर के लिए जिसने देखा जान लिया कि जोड़ी अनमेल है और जिसने जनम दिया, पाला-पोषा, शील-स्वभाव दिन-रात देखा उसकी आँखों पर कैसी पट्टी बंधी थी या कैसी विवशता थी कि उसे यह रिश्ता जँचा! आज के दौर में भी यह घटता है। इस विवाह से नववधू ने पाया क्या? पहले सारे अरमान गए फिर सुन्दर प्रेम के स्वप्न मिटे फिर मिटी धुंधली-धुंधली यादें बचपन की भी यौवन की भी मिला पति औ ससुराल! माता-पिता जो तीर्थ गए तो फिर ना लौटे! घर की समृद्धि भी ससुर के साथ ही सिधार गई। पति परदेश कमाने गया तो वहीँ का होकर रह गया, न खबर भेजी न सुध ली और ना ही संबंध के प्रति वफादार रह सका। माँ सी सास का साथ बचा था सो भी छूटा, घर की छत भी टूटी और दिन फिरने की आस भी टूटी। दीन-मलिन-कृशकाय सी एक छोटे बच्चे की माँ, अपने मरण की घड़ी करीब जान अपने बच्चे के पालन का भार पड़ोस की ब्राह्मणी की सौंपती हुई ! देवबाला ऐसी निराश और हतप्रभ तो कभी न थी ! पिता ने कन्यादान किया या कन्या के स्वप्न दान किए !
इस विवाह से बस पितृसत्ता के सामाजिक प्रतिष्ठा की तुष्टि हुई ! क्या हुआ जो देवबाला का जीवन क्षत-विक्षत है ? क्या हुआ जो उसका बालक अन्न बिना मरणासन्न है ? घर के पास रहने वाली उस बूढी अम्मा को छोड़कर और कौन है समाज के नियम-कानूनों के ठेकेदारों में जिसे देवबाला की आज परवाह है ? प्रीत की रीत निराली होती है। यह भाग्य के रूप में उन दोनों के सच्चे प्रेम की शक्ति ही तो है जो असहाय बेसुध पड़ी देवबाला की मदद को वह साधू वेशधारी देवनंदन जाने कहाँ से प्रकट हो जाता है। प्रेम की निर्मलता का चरमोत्कर्ष है इन दोनों का मर्यादित चरित्र। धन्य है यह निःस्वार्थ प्रेम जो सिर्फ प्रेम के लिए किया गया और प्रिय के हित में समर्पित रहा। देवनंदन देवबाला के लिए जीवनयापन की सारी व्यवस्था करके उसके परदेश गए हुए पति को खोजने चला जाता है। न सिर्फ खोजकर बल्कि उसे सुधारकर भी लाता है पर तबतक काफी देर हो चुकी होती है। वह लौटता है पर देवबाला की सांस छूटने के समय। थोड़ा बतियाकर वह धरती से अपना दामन छुड़ा लेती है, इस कामना के साथ कि जो दुःख इस जन्म में मिला वह अगले जन्म में ना मिले।
देवनंदन भी अपने देस की खोटी रीत छुड़ाने और दस का भला करने में लग गए। रमानाथ भी इसमें सहयोगी बना। सच्चे चरित्रवान इंसान के संग से पतित चरित्र वाला व्यक्ति भी जनकल्याण में लग गया। देवबाला के जीवन के इस हश्र का अनुमान उसकी माँ हेमलता ने पहले ही लगाया था, उसने अपने पति से कहा था, “जनम भर के लिए लड़की धूल में मिला दी जावे, यह कोई हंसी की बात नहीं है।… जिस हंसी से हमारा कुछ बिगाड़ नहीं हो सकता, उस ओर तो हमारा मन जाता है, पर कैसे पछतावे की बात है, जिस काम के करने से हमारी लड़की जनम भर बिपत की नदी में डूबती उतराती रहती है, उस काम के न करने की ओर हमारा मन नहीं जाता। आप मेरी इन बातों को सोचें और अपनी फूल ऐसी सुकुआरी लड़की को ऊसर में न फेंकें।” (दूसरा ठाट)। यह बात अनसुनी कर दी गई बुद्धिमत्ता को नकारते हुए एक कुपात्र को कन्यादान कर दिया जो कन्या का बलिदान बन गया।
जाति प्रथा और दहेज की समस्या आज भी समाज में विद्यमान है। इसके लिए कानून भी हैं फिर भी आए दिन इनसे जुड़ी दिल दहलाने वाली खबरों से सामना होता ही रहता है। बड़े-बड़े प्रतिष्ठित और विद्वान वधूपक्ष की विराटता भी इसकी विकरालता के समक्ष लोपजाती है फिर गरीबों और असहायों की क्या बिसात! दहेज अपनी पुत्री को स्वेच्छा से दिया गया प्रेमोपहार है। यदि इसका यह विकृत स्वरूप समाज में प्रचलित न होता तो शायद न अजन्मी बेटियों की हत्या होती और ना ही उनके जन्म पर मातम छाता! आवश्यकता है रुढियों से मुक्त होने की, विचारवान बनने की और मानव को मानव समझने की साथ ही इन बेअसर कानूनों को असरदार बनाने के लिए आवश्यक प्रक्रम करने की भी। पूर्ण जागृत और सक्रिय जनचेतना के समक्ष अन्याय और अमानवीयता का ठहर सकना नामुमकिन है।
भाषा के संबंध में भी ऐसी ही जागृति की बात करते हुए डॉ.जी.ए.ग्रियर्सन ने बी.काशी प्रसाद को लिखे अपने पत्र में लिखा है,“मेरी इच्छा है कि और लोग भी ‘हरिऔध’ के बनाए हुए “ठेठ हिंदी का ठाट”के स्टाइल में लिखने का उद्योग करें और लिखें- जब मैं देखूँगा कि पुस्तकें वैसी ही भाषा में लिखी जाती हैं, तो मुझको फिर यह आशा होगी कि आगामी समय इस भाषा का अच्छा होगा, जिसको कि मैं तीस वर्ष से आनंद के साथ पढ़ रहा हूँ। ”इन हिंदी सेवी विद्वान् की हिंदी निष्ठा को उजागर करने वाला यह पत्र गद्यकोश (हरिऔध, अधखिला फूल, समर्पण) पर उपलब्ध है। ‘ठेठ हिंदी का ठाट’ उपन्यास भाषा और जीवन के मर्म की सह-अभिव्यक्ति है। ‘ठेठ हिंदी’ का ठाट कायम रहे।

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