जश्ने आजादी का सच : इस देश के सबसे बड़े अस्पताल में आम आदमी के इलाज की व्यवस्था कहां है मोदी जी?

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तो देश के सबसे बड़े अस्पताल में आम आदमी को इलाज के लिए सालों तक इंतजार करना ही, सात दशक के लोकतंत्र की विकास यात्रा है?
#एम्स
@अरविंद सिंह
जब बीते 23जुलाई को कैफियत एक्सप्रेस पकड़ आजमगढ़ से दिल्ली चला तो मन में यह भाव था कि अधिकतम एक सप्ताह में एम्स से फारिग होकर वापस लौट जाएंगे। लेकिन जब एम्स में पहुंचा और भीड़ का रेला देखा तो तबियत नासाज़ होने लगी। किसी तरह ओपीडी कार्ड सुबह से लाइन में लगने के बाद 2:50 बजे बना। भांजा स्वपनील और पत्रकार मित्र वसीम अकरम के साथ बारी बारी से लाइन लगाए रखें। जबकि हमने आज के तिथि का अपाईमेंट आनलाईन करा रखा था। लेकिन इसके बाद भी डाक्टर का ओपीडी कार्ड बनाना ही पड़ता है। हृदय,वक्ष एवं तंत्रिका विज्ञान केंद्र (सीएनसी) एम्स के सीनियर कार्डियोलाजिस्ट प्रोफेसर राकेश यादव कमरा न०-11 के नाम कार्ड और फाइल बनी। जब आप एम्स में काउंटर पर पहुँचते हैं तो, काउंटर वाले कर्मचारी तय करते हैं की आप की केस किसको भेजना है। इससे यह नहीं तय हो जाता है कि काउंटर पर बैठने वाला इतना जानकार होगा कि आप के केस को देखकर निर्णय कर ले कि किसे भेजना है। दरअसल वह रैंडम जिसके पास उस डेट में अपाईमेंट कम होता है, उसके पास भेज देता है। लगभग बारह कमरे हैं, जिसमें 6में कार्डियोलाजिस्ट और 6में इसी के सर्जन बैठते हैं। काउंटर पर एक पीले रंग का ए-3 लिफाफे में आप की फाइल बनती है। जिसमें आप का सारा विवरण और एम्स में जांच और आपरेशन संबंधित सादे फार्म और पेपर रखे रहते हैं।

जब हम राकेश यादव के लिए पहुंचे तो दो घंटे के बाद हमारा नाम बोला गया। अंदर पिताजी को लेकर पहुंचे तो मालूम चला की ये राकेश यादव नहीं सीनियर रेजिडेंट डाक्टर स्वाति और बैंकटेश्वर हैं। पूरी केस हिस्ट्री तैयार किया और कुछ दवाईयां लिखने के साथ राकेश सर से मिलने को बोली। जब तक हम राकेश यादव के यहां पहुंचे पता चला, यादव जी जा चुके हैं। अब अगले सप्ताह के ओपीडी तिथि पर आइए।
फिर हम सभी लोग यानि वसीम, उपेन्द्, स्वपनील, मैं और पिताजी इसके कैंटीन में गये और चाय नाश्ते के साथ की। दिल्ली जैसे मंहगे महानगर में इतने सस्ती खाद्य सामग्री इस कैंटीन में मिल रही है और वह भी लकदक स्वच्छता के साथ।आश्चर्य से कम नहीं था। कैंटीन से सटे अमृत मेडिकल सेंटर पर दवाईयां छूट पर मिलती है, जबकि कुछ दूर जाने पर एम्स की तरफ से एक मेडिसिन शाप है, जहाँ मुफ्त में दवाईयां भी मिलती हैं, लेकिन इसके लिए लंबी कतारों में संघर्ष करनी होगी। और दवाईयां भी जेनरिक मिलती हैं। हमने अमृत से खरीदना ही उचित समझा और भांजे को लाइन में लगा दिया। कोई आधे घंटे बाद दवाईयां मिल गयी।
और ओला कैब बुक कर राजौरी गार्डन अपने ठीकाने को निकल लिए। यह कोई 26जुलाई का दिन था और हम अभी नये नये एम्स के रोगी बने थे। फ्लैट पर पहुंचते थकान के मारे हम बिस्तर पकड़ लिए और फिर दवा हमें भी मंगानी पड़ी।
जब अगले सप्ताह में फिर राकेश यादव के यहाँ पहुंचे तो रिपोर्ट और केस हिस्ट्री देखते ही बोले ‘बाबा! आपरेशन करा लो’। हमने बताया की पीजीआई के सर्जन डाक्टर निर्मल गुप्ता ने आपरेशन ना करने की सलाह दी है। यह सुनते ही बोले, ‘लोग काम नहीं करना चाहते हैं।’ यह कहते हुए उन्होंने सर्जरी विभाग के लिए रेफर कर दिया। हांलाकि लखनऊ का केजीएमयू ने भी बाईपास के लिए सजेस्ट किया था। लेकिन आपरेशन दिल्ली कराने की सलाह दी थी।
यहाँ से एकबार फिर काउंटर न०37 पर जाना पड़ा और वे फिर फाइल लेकर एक नया ओपीडी कार्ड के साथ सर्जरी विभाग में डाक्टर सचिन तलवार के यहां कमरा न०6 में भेज दिया। जब हम फाइल लेकर पहुंचे तो उस फाइल को लेकर उनका सहायक अंदर गया और कोई आधे घंटे बाद आया बोला यह फाइल लेकर जाइए और अगले डेट पर आइएगा। अगले डेट पहुंचे तो मालूम चला डाक्टर ही नहीं हैं। फिर अगले डेट पर आइए। इस तरह तीन चार डेट के बाद एक दिन सीनियर रेजिडेंट डाक्टर ने अंदर बुलाया और हमारे केस को डाक्टर मिलिंद पी होते को रेफर कर दिया। होते साब, मराठी हैं और देश के बेस्ट सर्जनों में से एक हैं। और हम भी इन्ही मिलिंद साब को चाहते थे। कारण, सचिन तलवार के यहां चक्कर लगाते लगाते एक दिन सुबह रोहिणी सेक्टर-22 पहुंच गये। डाक्टर दिनेश चंद्रा कार्डियोलाजिस्ट से मिलने। डाक्टर चंद्रा, पहले एम्स में तैनात थे और उसके बाद डाक्टर त्रेहन के टीम में मेदांता चले गये थे। अब श्री अग्रसेन इंटरनेशनल हास्पिटल में सेवा दे रहे हैं। डाक्टर चंद्रा के यहाँ पहुंचाने की माध्यम बनी महिला पत्रकार श्वेता रश्मि जी, जो दिल्ली महिला प्रेस क्लब में हैं। वरिष्ठ पत्रकार और एक्टिविस्ट हैं। उन्होंने पिताजी जी के केस में एक अतिरिक्त सलाह लेने की बात की, और बात ही नहीं की बल्कि अपने परिचित डाक्टर दिनेश चंद्रा से भी बात की। यह श्वेता जी का मानवीय पहलू था, जो एक पत्रकार साथी प्रति दिखाई दिया। इस बात का एहसास मेरे जैसे माटी से जुड़े लोग कभी नहीं भूल सकते।
दिनेश चंद्रा जी ने हमारे केस को न केवल देखा बल्कि नि:शुल्क परामर्श भी दिया और आपरेशन करा लेने को बोला। उन्होंने बड़े आत्मीयता से कहा कि आप मिलिंद सर या एके बिसोई सर से ही आपरेशन कराइएगा।मैं भी बोल दूंगा।
लगातार दौड़ लगाकर, उबाऊ और थकाऊ प्रक्रियाओं से गुजरते हुए कल यानि 14 अगस्त को हमे डाक्टर मिलिंद होते ने4 सितम्बर 2020 का डेट आपरेशन का दिया। मैं यह देखकर हैरान था कि हार्ट पेसंट के आपरेशन की इतना लंबा डेट का मतलब क्या है । फिर मैंने आग्रह किया और दिनेश सर का रिफरेंस दिया तो बोले एक बार अगले महिने के प्रथम सप्ताह देख लेना।
बाहर देखा तो बहुतों को 2020,2021,2022-24 का भी डेट मिला है।
हम सोच रहे थे कि आज जश्ने आजादी है और हमारे देश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान एम्स के संसाधनों ने कुल इतना ही प्रगति किया है कि गंभीर बीमारी के आपरेशन भी बेड खाली न होने के कारण, मरीज के अनुपात में चिकित्सक न होने के कारण, बरसों बरस इंतजार करना पड़ता है। आखिर इस देश के गरीब और आम आदमी का अस्पताल कहां है। इतने योग्य चिकित्सक होने के बाद भी आम आदमी को इलाज के लिए सालों इंतजार करना क्या हमारे 72साला लोकतंत्र की विकास यात्रा कि कहानी नहीं बयां कर रहा है। फुर्सत मिले तो जरा इधर भी सोचें…अच्छे दिन सिर्फ हमारे सपनों में नहीं हकीकत में भी तो दिखे।

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