जनता है हम तुम्हारी जागीर नहीं ।।

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संजय सिंह राजपूत
बहुत दिनों बाद एक दिन मेरी मुलाकात रमूआ से गांव के बाहर हो गई। एक – दूसरे से औपचारिक हाल – चाल पूछने के बाद मैंने उसके परिवार का हाल – चाल पूछा।
रमूआ बचपन से लेकर अब तक, जब वह बीस वर्ष का हो चुका है। एक ही बात को लेकर परेशान हैं। वह कहने लगा,
हमारे भारत में आज कुकुरमुत्ते की तरह हर राज्य में आठ दस राजनीतिक दल मिल जायेंगी, इससे ज्यादा सामाजिक कार्य करने वाली संस्थाएं भी मिल ही जाएगी। बावजूद इसके आजादी से लेकर आज तक हमारे देश की हालत जस की तस बनी हुई है। सभी राजनीतिक दलों का एक ही लक्ष्य है, और वो है आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, या यूं कहें कि सम्पूर्ण भारतवर्ष का विकास। पर अफसोस, यह सब सत्ता में आने से पहले का ही लक्ष्य होता है, सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि सामाजिक संगठनों का निर्माण भी लगभग इसीलिए होता है, लेकिन सामाजिक कार्य करते – करते ये संगठन भी आगे चलकर किसी ना किसी राजनीतिक दल को समर्पित हो जाती है।
राजनीतिक दलों और संगठनों के पदाधिकारियों का विकास तो तेजी से संभव हो जाता है, पर आम जन वही के वही रह जाते हैं। हर पांच साल में एक बार चुनाव होता है। चुनाव से पहले बड़े – बड़े वादे जिनमें आम जनमानस को सिर्फ विकास ही विकास दिखाई देता है। लेकिन चुनाव जीतने के बाद विकास आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक शैक्षिक, आदि का नहीं बल्कि वह तो जन प्रतिनिधियों के परिवार वालों, मित्रों का ही हो पाना मुश्किल होता है।
कुछ संगठन हिंदू धर्म का प्रचार करने तथा उनके विकास की बात कर हिंदूओं को बरगलाने का काम करते हैं, तो कुछ मुस्लिम धर्म के लोगों का मसीहा बन जाते हैं और उनका विकास करने लगते हैं। और यह बहुत सरल तरीका है आम जनमानस से जुड़े रहने का। जनता उन्हें अपना मसीहा मान उनको समाज में ऊंचा दर्जा भी दिलाती है, पर अफसोस कि जनता के प्रतिनिधि महोदय ऊंचे आसन पर विराजमान होते ही अपने आप को शहंशाह समझने लगते हैं। कुछ संगठन तो ऐसे भी हैं जो अपने धर्म के लोगों को अपनी जागीर समझने लगते हैं। उनका मानना है कि ये लोग तो हमारे अपने हैं ही कहा जाएंगे। दूसरे धर्म के लोगों को अब अपने तरफ आकर्षित करना चाहिए।
लेकिन वो लोग यह भूल उजाते हैं कि जनता अब इक्सवी सदी में प्रवेश कर चूंकी है। जनता समझदार हो गई है। यह जनता आपके धर्म की है ना कि आपकी जागीर।।

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