गाजीपुर जेल से छूटते ही पदयात्रियों ने कहा, ‘यह सत्याग्रह रूकने वाला नहीं है..!’

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जेल से रिहा होते ही सत्याग्रहियों ने कहा....
@अरविंद सिंह
पिछले 2फरवरी को गोरखपुर के चौरी चौरा से राजघाट दिल्ली तक पदयात्रा हमारे समय के गांधीवादी नौजवान सत्याग्रहियों और पत्रकारों की एक बेहद उम्मीद भरी पहल थी और है। इस सत्याग्रही पदयात्रा में एक महिला पत्रकार प्रदीपिका सारस्वत भी थी। अभी यह यात्री लगभग 200 किमी चलकर गाजीपुर की सीमा में प्रवेश भर की थी, कि गाजीपुर में ये सत्याग्रही बिरनो थानाक्षेत्र में गिरफ्तार कर लिए जाते हैं। एसडीएम सदर प्रभाष कुमार की कोर्ट उन सभी दस सत्याग्रहियों को 11फरवरी को उसी दिन जेल भेज देती है। क्योंकि उपजिलाधिकारी को इन पदयात्रियों से शांति भंग की प्रबल संभावना लगती है। ये घटना हमारे समय की सबसे बर्बर घटना होती है, जिसमें पदयात्रा और सत्याग्रह से सरकार तक हिल जाती है।

कुछ लोगों द्वारा जब जमानत के प्रयास किए जाते हैं तो एसडीएम द्वारा ऐसी ऐसी शर्तें लगायीं जातीं हैं, जो अंग्रेजीराज की याद दिलाती हैं। हिंसा के विरुद्ध गांधीवादी हथियारों का प्रयोग सत्याग्रह की ताकत से कोई सरकार इतनी भयभीत हो सकती है कि उसे सत्याग्रही पदयात्रियों से डर लगने लगता है। हद तो तब हो जाती है जब कुछ युवा और बौद्धिक लोग जो विभिन्न विचारधाराओं के थे, इसकी विरोध और उपवास रखने की घोषणा भर से उन्हें भी सरकारी दमन का सामना करना पड़ता है। उन सभी सपा और कांंग्रेस केे युुवा विंंग को पुलिस की लाठियाँ मिलती हैं। उन्हें भी उसी धारा में गिरफ्तार किया जाता है, जिसमें उन पदयात्रियों को जेल भेजा जाता है। लेकिन जनदबाव और राजनीतिक दबाव के कारण आंदोलन करने वालों को 15फरवरी को देर शाम छोड़ दिया जाता है।

इसी के साथ जेल में बंद सत्याग्रहियों ने भूख हड़ताल की घोषणा भी कर दी,जिसे जबरन समाप्त करा दिया गया। आंदोलन की आंच पूर्वांचल सहित दिल्ली की मीडिया तक पहुंचती है।
परिणाम स्वरूप 16 फरवरी जाते जाते सत्याग्रहियों को देर शाम एक एक लाख के निजी मुचलके पर रिहा कर दिया जाता है।जबकि यह मुचलके की राशि पहले ढाई लाख रखी गई थी। और एक सनक भरे आदेश में दो राजपत्रित अधिकारियों की गांरटी भी मांगी जाती थी। सत्याग्रहियों का मानना है कि चाहे जितनी भी बर्बरता क्यों न कर ले सरकार, यह पदयात्रा दिल्ली राजघाट तक पहुंच कर रहेगी। हमारे संवाददाता अमरजीत राय के अनुुसार जिला प्रशासन पदयात्रियों को आज गाजीपुर की सीमा के बाहर छोड़ेगी।जबकि पदयात्री अपनी पदयात्रा वहीं से शुरु करना चाहते थे, जहां से वह अवरुद्ध हुई थी।लेकिन प्रशासन इसके लिए तैयार नहीं है। सत्याग्रहियों ने आगे की पदयात्रा आज से  गाजीपुर के सीमावर्ती क्षेत्र नंदगंज से वाराणसी के लिए शुरू करेंगे। और वाराणसी से इस सत्याग्रह में कुछ और जुड़ सकते हैं।

15 फरवरी को प्रदीपिका सारस्वत का लिखा एक संस्मरण ःः

मैने 31 साल के अपने जीवनकाल में कभी नहीं सोचा था कि मुझे जेल से आपको संबोधित करने का अवसर मिलेगा. गाजीपुर जेल में यह मेरा पांचवां दिन है. जेल के महिला वार्ड में पिछले चार दिनों का अनुभव बहुत कुछ सिखाने वाला है. ये सीखें इस देश के बारे में भी हैं, और मेरे बारे में भी. जेल में गांधी की ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़ते हुए ये सीखें और संघनित हो उठती हैं. मैं देखती हूं कि शासकों के बदल जाने से शासन बहुत नहीं बदलता, अगर शासकों की मंशा न बदले. यह बात मैं किसी पार्टी या सरकार विशेष के संबंध में नहीं कह रही हूं.

दस पदयात्रियों, जिनमें एक पत्रकार भी शामिल है, को पकड़कर जेल में डाल दिए जाने के पीछे शासकों की मंशा आखिर क्या हो सकती है? हमारे पैदल चलने से यदि देश या राज्य में शांति भंग की आशंका है तो क्या इस सवाल पर विचार नहीं किया जाना चाहिए कि प्रदेश की शांति कितनी भंगुर है।

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