क्या लिखा था लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रूक्स और ब्रिगेडियर प्रेमिंदर सिंह भगत ने अपनी रिपोर्ट में?

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अजय श्रीवास्तव
भारत चीन के साथ 1962 के युद्ध में बुरी तरह पराजित हुआ था।भारतीय सेना की भूरी भूरी प्रशंसा होती है मगर 1962 के युद्ध में कुछ जगह सेना बिना आदेश के पीछे हट गई थी,ऐसा आत्मरक्षा के लिए भी किया गया होगा मगर सेना की तरफ से इसे अनुशासनहीनता माना गया और 14 दिसंबर,1962 को तत्कालीन थलसेनाध्यक्ष द्वारा भारतीय सेना के युद्ध(विशेष रूप से नेफा के कानेंग डिवीजन)में पीछे हटाने की जाँच हेतु एक सामरिक गतिविधियों का पुनरीक्षण प्रारंभ कराया गया।यह रिव्यू लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रूक्स द्वारा किया गया जिसमें ब्रूक्स के सहयोगी ब्रिगेडियर पी.एस.भगत थे।इस रिव्यू का काम प्रशिक्षण, उपकरण, कमान की व्यवस्था, सैन्य दलों की शारीरिक सक्षमता और सभी स्तरों पर कमांडरों द्वारा अपने अधीनस्थों को प्रभावित कर पाने की क्षमता के संदर्भ में हुई गलतियों की जाँच करना था,जिसे हेंडरसन ब्रूक्स रिपोर्ट कहा जाता है।
हेंडरसन और उसके नायाब भगत ने युद्ध में पराजय समेत बहुत से पहलुओं पर जाँच की और रिपोर्ट सेना को सौंपा।सेना से ये रिपोर्ट सरकार के पास गई मगर सरकार ने उस गोपनीय रिपोर्ट को कभी जारी नहीं किया।कारण ये था कि उस रिपोर्ट में राष्ट्रीय नेतृत्व की विफलता का भरपूर वर्णन था।तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निर्णय न ले पाने पर सवाल उठाए गए थे।रक्षामंत्री कृष्णा मेनन जिसपर नेहरू बहुत ज्यादा भरोसा करते थे।वे युद्ध के समय फैसला लेने में असमर्थ साबित हुऐ थे।तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल बीएम कौल की अकर्मण्यता की भी खूब पोल खोली गई थी।वे नेहरू को सच से वाकिफ नहीं करा सके।
1962 के युद्ध के समय भारतीय सेना की तैयारी शून्य थी जबकि चीन कई महीनों से तैयारी कर रहा था।आर्मी चीफ को चाहिए था कि वे प्रधानमंत्री को वास्तविकता समझाएं मगर वे विफल साबित हुऐ।नेहरू को बिल्कुल भरोसा नहीं था कि चीन भारत पर आक्रमण भी कर सकता है मगर जब ये युद्ध हुआ तो भारत बैकफुट पर आ गया।भारत डर के मारे एयरफोर्स का इस्तेमाल नहीं किया कि चीन भारतीय शहरों पर बम डालकर व्यापक तबाही मचा सकता है और ये सही भी था।चीन के आक्रमण से भौचक भारतीय नेतृत्व अमेरिका से सहयोग मांगता रहा मगर चतुर अमेरिका भारत के लिए चीन जैसे देश को नाराज नहीं करना चाहता था।नेहरू ने अमेरिकी राष्ट्रपति जाँन फ केनेडी से तत्काल बारह जेट फाइटर्स और आधुनिक रडार सिस्टम देने की मांग की थी मगर अमेरिका इस मामले में चुप हीं रहना बेहतर समझा।
दरअसल नेहरू चीन पर जरूरत से ज्यादा विश्वास करते थे जो भारत की हार का कारण बना।भारत के कारण हीं चीन को वीटो का अधिकार मिला था मगर चीन ने भारत की पीठ में खंजर घोंप दिया था।
चीन का आक्रमण सुनियोजित था और उसने चारों तरफ से भारत पर आक्रमण किया।चीन ने इस युद्ध में अपनी सेना के 80,000 जवान उतारे थे जबकि भारत 20,000 सैनिकों से लड रहा था।उसके पास आधुनिक हथियार थे जबकि भारत के पास वही परंपरागत हथियार।चार दिन की लडाई में चीन अरूणाचल प्रदेश के 60 किलोमीटर अंदर आ गया था।युद्ध विराम के बाद भी चीन अरूणाचल प्रदेश के बहुत से हिस्सों में आज भी काबिज है।
1962 के युद्ध में भारत क्यों हारा इसकी विस्तृत रिपोर्ट दो भागों में तैयार कर ब्रूक्स और भगत ने सेना के माध्यम से सरकार को दी थी मगर आज भी उस महत्वपूर्ण रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया।कांग्रेस सरकार को तो इसके ऊपर बात करना भी गवारा नहीं था मगर एनडीए की सरकार ने भी राष्ट्रहित का मसला कहकर टाल दिया।तत्कालीन रक्षामंत्री अरूण जेटली ने 2015 में राज्यसभा में दिये हुऐ बयान में कहा कि इसके महत्वपूर्ण हिस्से कभी भी सार्वजनिक नहीं किये जा सकते क्योंकि ये राष्ट्रहित में नहीं है।
आपको बता दें ये रिपोर्ट केवल कांग्रेस सरकार की विफलता को हीं प्रर्दशित करती तो इसे कब का जारी कर दिया गया रहता मगर इसमें सेना के पीछे हटने, पीठ दिखाने का विस्तृत विवरण है जो कोई भी सरकार सार्वजनिक नहीं करना चाहेगी।यद्यपि इसके कुछ भाग 2014 में मैक्सवेल ने प्रकाशित कर दिया था।अब ये कहना मुश्किल है कि ये वही रिपोर्ट है या फर्जी।

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