क्या गाँधीजी ने सरदार पटेल के साथ अन्याय किया था?

Debate Political News

-Ajay Srivastava
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द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होते होते ब्रिटिश हुकूमत बेहद कमजोर हो चुका था और भारत का स्वत्रंत्रता के लिए संघर्ष बेहद मुखर।ब्रिटिश हुकूमत की तरफ से संकेत आने शुरू हो गए थे कि भारत को आजाद कर दिया जाएगा।1946 में कुछ वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारी जो बेहद सुलझे हुए थे उन्हें ये जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे भारतीय नेताओं से बात कर आजादी के लिए मार्ग प्रश्स्त करें।
अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय नेताओं के साथ खूब माथापच्ची की और ये तय हुआ कि भारत में एक अंतरिम सरकार बनेगी।अंतरिम सरकार के तौर पर वायसरॉय की एक्जीक्यूटिव काउंसिल बननी थी और अंग्रेज वायसरॉय को इसका अध्यक्ष होना था जबकि कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को इस काउंसिल का वियस प्रेसिडेंट बनना था।ये भी तय हुआ कि वाइस प्रेसिडेंट हीं स्वत्रंत भारत का प्रधानमंत्री बनेगा।
जब ये निर्णय हुआ था तब मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस अध्यक्ष थे और वे चाहते थे कि वे हीं अध्यक्ष बने रहें मगर महात्मा गांधी ने उन्हें आदेश दिया कि वे तत्काल अध्यक्ष पद से इस्तीफा दें,अनिच्छा से हीं सही आजाद ने बापू के कहने पर इस्तीफा दे दिया।
मौलाना आजाद के इस्तीफे के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष की खोज शुरू हुई।गाँधीजी ने अपने मन की बात(नेहरू को अध्यक्ष चुनने)सबको कह दी थी मगर चुनाव प्रक्रिया को तो पूरा करना हीं था इस वजह से पार्टी महासचिव आचार्य जे.बी.कृपलानी ने अप्रैल,1946 में पार्टी के कार्यसमिति की बैठक बुलाई।इस बैठक में सभी वरिष्ठ कार्यसमिति के सदस्य मौजूद थे जिसमें महात्मा गांधी, सरदार पटेल, नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, अब्दुल गफ्फार खान आदि आदि।
बैठक की शुरुआत करते हुए पार्टी महासचिव कृपलानी ने गांधी जी से कहा,”बापू ये परंपरा रही है कि कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव प्रांतीय कमेटी उम्मीदवार के पक्ष में प्रस्ताव भेजकर करती है।किसी भी प्रांतीय कमेटी ने जवाहर लाल का नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित नहीं किया है।15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने सरदार पटेल और बची हुई तीन कमेटियों ने मेरा और पट्टाभि सीतारमैय्या का नाम प्रस्तावित किया है।
पार्टी महासचिव और वरिष्ठ नेता कृपलानी के ये कहने पर कार्यसमिति की बैठक में सन्नाटा छा गया, किसी के मुँह से कोई बात नहीं निकल रही थी।गाँधीजी ने भी मौन धारण कर लिया था।
आपको बता दें गाँधीजी ने खुलेआम नेहरू की तरफदारी की थी मगर यहाँ तो मामला पलट गया था।गाँधीजी के मौन धारण करने पर आचार्य कृपलानी उठे और कहा,बापू की भावनाओं का सम्मान करते हुए मैं जवाहरलाल का नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित करता हूँ।”ये कहते हुऐ आचार्य कृपलानी ने एक कागज पर जवाहरलाल का नाम खुद से प्रस्तावित कर दिया।कई दूसरे वर्किंग कमेटी के सदस्यों ने अपने हस्ताक्षर किए।ये कागज बैठक में मौजूद सरदार पटेल के पास भी पहुंचा, उन्होंने भी हस्ताक्षर कर दिये।
महासचिव कृपलानी ने एक और कागज लिया, उस कागज पर उन्होंने सरदार पटेल को उम्मीदवारी वापस लेने का जिक्र किया और सरदार पटेल की तरफ हस्ताक्षर के लिए बढा दिया, सरदार पटेल ने उस कागज को पढा मगर हस्ताक्षर नहीं किये।अब फैसला महात्मा गांधी के पाले में आ गया था मगर गाँधीजी नेहरू के पक्ष में दृढसंकल्पित थे मगर उन्होंने कहा जवाहरलाल किसी भी प्रांतीय कमेटी ने तुम्हारा नाम प्रस्तावित नहीं किया है, तुम्हारा क्या कहना है?जवाहरलाल सर नीचे किए बैठे रहे और कोई जवाब नहीं दिया।भरी बैठक में महात्मा गांधी का ये सवाल जवाहरलाल को ये मौका दे रहा था कि वे सरदार पटेल के प्रति समर्थन का सम्मान करें।नेहरू की चुप्पी को देखते हुए महात्मा गांधी ने सरदार पटेल की तरफ कागज बढाकर हस्ताक्षर करने के लिए कहा।सरदार पटेल ने महात्मा गांधी के निर्णय का कोई विरोध नहीं किया और उस कागज पर हस्ताक्षर कर दिये।
अब ये प्रश्न उठता है कि गाँधीजी ने बहुमत का सम्मान क्यों नहीं किया?उन्होंने सरदार पटेल के हक पर डाका क्यों डाला था?
आपको बता दें कि गाँधीजी जवाहरलाल नेहरू की काबिलियत के कायल थे।विदेश में पढ़ेलिखे नेहरू अंग्रेजों से नर्म मिजाज में बात करते थे और उन्हें अपनी बात मनवा लेते थे।सरदार पटेल थोडे गर्म मिजाज के थे और बहुत जल्दी नाराज हो जाया करते थे।उम्र भी जवाहर लाल के पक्ष में चुगली कर रही थी।फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना और पाश्चात्य जीवनशैली भी पंडित नेहरू के पक्ष में गया।गाँधीजी के जेहन में ये सारी बातें जरूर रहीं होंगी तभी उन्होंने नेहरू का चुनाव किया था।उन दिनों वरिष्ठ पत्रकार दुर्गादास को साक्षात्कार देते हुए गाँधीजी ने ये कहा था कि हमारे कैंप में जवाहरलाल अकेला अंग्रेज है और वह कभी सरकार में दूसरे नंबर का पद नहीं लेगा,जबकि सरदार पटेल को राजी किया जा सकता है।
सरदार पटेल गाँधीजी के आग्रह पर गृहमंत्री बनें मगर दोनों के रिश्ते बेहद तल्ख हो चुके थे।हर मुद्दे पर विवाद होने लगा था और दोनों ने महात्मा गांधी से कहा कि वे साथ काम नहीं कर पाएंगे।साल 1947 में देश भर में दंगा भडक गया था।तमाम कोशिशों के बावजूद दंगों पर काबू नहीं पाया जा रहा था।गाँधीजी भी प्रयास कर रहे थे वे जगह जगह जाकर दोनों समुदाय से शांति की अपील कर रहे थे।इसी बीच अजमेर में जबरदस्त सांम्प्रदायिक दंगा शुरू हुआ।गृहमंत्री पटेल ने कारण जानने के लिए गृहमंत्रालय की एक टीम वहाँ भेज दी।इसी बीच प्रधानमंत्री नेहरू ने वहाँ स्वंय जाकर स्थिति को देखने की घोषणा कर दी,सरदार पटेल को ये नागवार गुजरा मगर वे चुप रहे।
अजमेर यात्रा के ठीक पहले नेहरू ने ये एलान कर दिया कि वे अजमेर नहीं जाएंगे बल्कि उनके पर्सनल सेक्रेटरी अजमेर का दौरा करेंगे।सरदार पटेल नेहरू के इस एलान से आगबबूला हो गए और कहा कि उन्हें उनके पर्सनल सेक्रेटरी के दौरे पर घोर आपत्ति है।दरअसल नेहरू के परिवार में किसी की मौत हो गई थी इस वजह से उन्होंने अपना दौरा कैंसिल किया था।नेहरू ने थोडे रूखेपन से ये भी कह दिया कि प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है और वह जहाँ भी जा सकता है और किसी को भी भेज सकता है।नेहरू की इस बाय पर पटेल भडक गए और उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री सबसे बड़ा नहीं होता बल्कि सिर्फ बराबरी के लोगों में पहले नंबर पर होता है।पटेल ने यहां तक कहा कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री से ये उम्मीद नहीं की जाती कि वह अपने मंत्रियों पर अपना हुक्म चलाएगा।
दोनों ने इस मुद्दे पर इस्तीफा देने की पेशकश कर दी मगर गाँधीजी ने उन्हें समझाया कि जब हम तीनों साथ बैंठेंगे तो मामले को सुलझा लिया जाएगा।गाँधीजी की मौत के बाद नेहरू जी के पहल पर ये मामला सुलझा था।
एक और झगडा जिसने सुर्खियां बटोरी थी वो राष्ट्रपति का चुनाव था।नेहरू सी.राजगोपालाचारी को देश का प्रथम राष्ट्रपति बनाना चाहते थे जबकि सरदार पटेल गंवई पृष्ठभूमि के डा.राजेंद्र प्रसाद को।सरदार पटेल बडी आसानी से राजेंद्र प्रसाद को देश का पहला राष्ट्रपति बना दिया,जवाहरलाल देखते रह गए।
जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल में शीतयुद्ध अपने चरम पे था,राष्ट्रपति चुनाव में मात खाने के बाद नेहरू चाहते थे कि कांग्रेस अध्यक्ष उनका कोई समर्थक बनें मगर सरदार पटेल ने उनके गृहनगर इलाहाबाद के पुरूषोत्तम दास टंडन जो उनके कट्टर विरोधी थे उनका नाम आगे बढाया।दरअसल टंडन की छवि एक धुरविरोधी दक्षिणपंथी नेता की थी और वे कांग्रेस के सांप्रदायिक खेमे के साथ खडे थे।नेहरू ने कई मौकों पर उनकी आलोचना भी की थी मगर वे सरदार पटेल के समर्थन की वजह से जीत गए थे।
सरदार पटेल जब तक जिंदा रहे नेहरू से उनकी तनातनी चलती हीं रही मगर जवाहरलाल सरदार साहब की बहुत इज्ज़त करते थे।उन्होंने सार्वजनिक रूप से कभी भी सरदार पटेल के बारे में कुछ नहीं कहा था।सरदार साहब की मौत पे जिसप्रकार वो फूटफूटकर रोए थे वो उनके अथाह प्रेम और सम्मान को हीं पर्दर्शित करता है।
महात्मा गांधी ने सरदार पटेल पर क्यों नेहरू को वरीयता दी इसका स्पष्ट जवाब तो अब कभी नहीं मिल पाएगा मगर ये तो तय है कि बापू ने नेहरू में जरूर कुछ ऐसा देखा होगा जो उन्हें इस प्रकार के फैसले लेने पर मजबूर किया था।

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