कृष्ण और मणिपुर के बारे में…थोड़ा लंबा है।

Literature Manipur
Nirala भैया की एक पोस्ट पढ़ने के बाद मुझे कुछ साझा करने की इच्छा हुई – 
पूर्व भारतीय राज्यों के मणिपुर में कृष्ण का बहुत महत्व है। यहाँ के समाज में वैष्णववाद के अनुशासन को जीया जाता है।वहीं 18 पुराणों के विष्णु पुराण (विष्णुधर्मोत्तर) में ये ज़िकर है कि वैष्णववाद या भगवत्वाद की शुरुआत मणिपुर में तब से हुई जब शान शासित राज्य के पोङ्ग ने विष्णु चक्र की मूर्ति (विष्णु या कृष्ण की प्रतीकात्मक चकती या चक्र) मणिपुर के राजा क्यंबा को तोफा स्वरूप दिया । इसलिए 1470 के दशक से मणिपुर के राजा विष्णु की पूजा करने लगे।
भारत के पश्चिम राज्यों से कई ब्राह्मण पुजारी मणिपुर आए और वहीं बस गए। ब्राह्मणों के सदस्यों के आगमन का लेखा-जोखा बामन खुनथोक के अभिलेखों में मिलता है। राजा क्यंबा (1467-1523) ने विष्णुपुर में एक विष्णु मंदिर का निर्माण किया, जो एक उल्लेखनीय स्थापत्य स्मारक है। 1704 में राजा चरई रोंगबा को वैष्णव परंपरा में शुरू किया गया था और तब से वैष्णववाद राज्य धर्म बन गया। इसने भारत के साथ सांस्कृतिक संपर्क को और भी मजबूत किया। राजा गैरीब निवाज़ 1709 से 1748 तक शासन कर रहे थे और उन्हें चैतन्य परंपरा के वैष्णववाद में शुरू किया गया था, नरोत्तम दास ठाकुरा के अनुयायियों द्वारा, जिन्होंने कृष्ण को सर्वोच्च देवता, श्यामा भगवन के रूप में पूजा किया था। उन्होंने लगभग बीस वर्षों तक इस धर्म का अभ्यास किया। प्रचारक और तीर्थयात्री बड़ी संख्या में आते थे और असम के साथ सांस्कृतिक संपर्क बनाए रखा जाता था। ऐसा माना जाता है कि गैरीब निवाज़ के पोते भाग्यचंद्र के शासनकाल के दौरान ‘कृष्ण भक्ति’ की लहर पूरे राज्य में फैल गई थी। 1994 में अमरेश दत्त और मोहन लाल अपनी किताब में लिखते हैं कि मणिपुरी वैष्णव केवल कृष्ण की पूजा नहीं करते, बल्कि राधा-कृष्ण की करते हैं। वो इसलिए साथ में राधा की पूजा करते हैं क्योंकि स्त्री के बिना किसी पुरुष का अस्तित्व वे नहीं मानते। वैष्णववाद के प्रसार के साथ मणिपुर क्षेत्र में कृष्ण और राधा की पूजा प्रमुख रूप बन गई। हर गाँव में एक ठाकुर-घाट और एक मंदिर है।जिसका उल्लेख ‘शांति स्वरूप’ जिसमें 5000 हजार सालों के भारतीय और पाकिस्तानी कला और शिल्प कौशल का लेखा जोखा दर्ज है। हालांकि मेरे मणिपुर में बिताए कुछ सप्ताह इस बात की गवाही जरूर है कि अपने संस्कृतियों को बचाने में हम उत्तर भारतियों की तुलना में वे ज्यादा जागरूक और उत्साही हैं।
चूंकि उस जमाने में इन राज्यों में जातीय-जनजातीय विविधता बहुत थी इसलिए नृत्य, संगीत या प्रतीक का प्रचलन अपनी बात को कहने-पहुचाने में ज्यादा होता था। ऐसे में मणिपुर में वैष्णववाद को बढ़ाने के लिए या स्थापित करने के लिए कृष्ण और गोपियों सम्बन्धों पर आधारित ‘रास-लीला’ की नृत्य शैली बहुत ही मशहूर और मन पर छाप छोड़ने वाली हुई। पाँच रास लीलाएँ हैं जो राधा और कृष्ण के दिव्य प्रेम से संबंधित हैं। जो हैं महारास, वसंतरस, कुंजरस, नित्यरस और दिव्यरस।
यहाँ की मेतई जनजाति की एक दंतकथा है। उसमें कहा गया है कि भगवान ने जब सृजन का निर्माण किया तो यह पृथ्वी पिंड के समान थी। इस नए बने गोले पर सात लैनूराह ने नृत्यि किया, नृत्य के दौरान अपने पैरों से इस गोल पिंड को मजबूत और चिकना बनाने के लिए इसे कोमलता से दबाया। यह मीतई जागोई का उद्भव है। आज भी जब मणिपुरी लोग नृत्य करते हैं वे कदम तेजी से नहीं रखते बल्कि अपने पैरों को जमीन पर कोमलता और मृदुता के साथ रखते हैं।
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