काश! मानसिक गुलामी और तर्कहीन मूढ़ताओं से लड़ पाता आजमगढ…!

Milestone Shakhsiyat


@ अरविंद सिंह
मित्रों! मेरे शहर के कुछ लोग पहले तो एक चिकित्सक को आजमगढ़ का वरदान और भगवान साबित करने की कोशिश कर रहे थे, और उसके अस्पताल को देवालय. अब उसकी डिग्रियों और उपलब्धियों का ऐसा चरित्र चित्रण कर रहे हैं, कि मानों न तो अतीत में ऐसी महानता और योग्यता किसी ने देखी होगी और नहीं भविष्य में देख पायेंगे. आजमगढ़ की धरती इनके चिकित्सीय अवदान के बिना निष्प्राण हो जायेगी. इन्होंने आजमगढ़ पर उपकार किया है यहाँ रूक कर. वह एहसान किया है नेता जी सुभाषचंद्र बोस के चालक का सम्मान करके. उसने जैसे,आजमगढ़ को केवल दिया भर हो,आजमगढ़ से जैसे कुछ लिया न हो..?
महानता का चारणगान और विरदावली गाने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि उसने सब कुछ इसी आजमगढ़ से लिया है. उसके आर्थिक और सामाजिक विस्तार के पीछे भी यही जनपद खड़ा है. अगर उसने आजमगढ़ को कुछ दिया है तो बदले में आजमगढ़ ने उसे सबकुछ दिया है. बावजूद अब यह बताया और समझाया जा रहा है कि उसने कौन कौन से बड़े और महान कार्य किए हैं. खैर समझाइए इससे दूसरों की लकीरें छोटी नहीं हो जाएगीं.

मित्रों! मैं भी इसी माटी का खा़कसार हूँ, और लगभग डेढ़ दशक पहले गांव की पगडंडियों से संघर्ष करते हुए नगर की ओर रूख किया है. गांव की सौंधी माटी की महक ने महानगरों की ओर जाने नहीं दिया और गांव को शहर बनाने का सपना बुनने लगें. लिहाजा, गांव की पाठशालाओं से होते हुए, पूरब के आक्सफोर्ड इलाहाबाद विश्वविद्यालय में विज्ञान स्नातक करते करते गांव और घर की मजबूरियाँ पुनः गांव के इस आदमी को गांव बुला लिया. लेकिन परिस्थितियों से हार नहीं माना. पूर्वांचल विश्वविद्यालय से संबद्ध कालेज शिब्ली नेशनल पीजी कालेज से कला स्नातक (बीए) और विधि स्नातक( एलएलबी) किया, नगर के ही डीएवी पीजी कालेज से परास्नातक ( हिंदी) और हरिशंकर जी महाविद्यालय से बीएड किया. यह सारी उपाधियाँ मैंने अपने गांव से ही लिया.

सन् 2000 में एक इंटरमीडिएट बालिका कालेज में पढ़ाना शुरू कर दिया और इसी के साथ आंचलिक पत्रकारिता से नाता भी जुड़ गया.यह नाता मैंने नहीं जोड़ा, बल्कि आंचलिक पत्रकारिता ने स्वयं मुझे खींच लिया.एक दशक तक आंचलिक पत्रकारिता के दर्द और वेदना को महसूस किया और ग्रामीण भारत और उसकी साझी संस्कृति की आवाज बुलंद किया. इसी बीच पत्रकारिता में एमफिल करने का अवसर मिला. इंस्टीट्यूट ऑफ नेशनल इंपाटेंस, राष्ट्रीय महत्व की संस्था ‘डीबीएचपी’ मद्रास से, जो चार राज्यों केरल, मद्रास, कर्नाटक, तेलंगाना में विस्तार लिए हुए है. इसके हैदराबाद केन्द्र पर प्रवेश परीक्षा में 30 सीट भर थी, जिसमें हमने भी आवेदन किया और उसमे दूसरे नंबर पर चयन होकर प्रवेश पाने में सफल हो गयें.और जब शोध का विषय चयन करने की बात आयी तो हमने उसी आंचलिक पत्रकारिता की चुनौतियों पर कार्य करना चाहा, जिसको एक दशक तक जीया था. पूर्वांचल के 28 जनपदों और सटे पश्चिमी बिहार के 7 जनपदों के पत्रकारिता के इतिहास और आंचलिक पत्रों के इतिहास और उसकी चुनौतियों पर रिसर्च किया. थिसिस जब जमा कर परीक्षा दे दिया, तो एक दिनअचानक फोन से ख़बर मिली की आप ने सबसे अधिक 85 फीसदी अंक के साथ हैदराबाद केन्द्र टाप किया है. केवल हैदराबाद केन्द्र ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय के चार राज्यों में फैले सभी केन्द्रों को भी टाप किया है.आप को एक नहीं बल्कि दो-दो गोल्ड मेडल (स्वर्णपदक) मिलेगा. मेरी आंखे भर आयीं.मैं गांव का देसी आदमी केवल एमफिल करने गया था. मैंने दो स्वर्ण पदक विजेता होने का सपना नहीं देखा था.और मेरी परिस्थितियों में यह सपना पालना जायज भी नहीं था.

सन्-2016 में मद्रास के दीक्षांत समारोह में आजमगढ़ के इस सामान्य से गांव के आंचलिक पत्रकार को कर्नाटक के लोकायुक्त और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के हाथों जब एक नहीं दो दो बार स्वर्ण पदक पहनाया गया तो मुझे इस बात पर गर्व हुआ कि मैं पूर्वी पट्टी के एक कस्बाई शहर आजमगढ़ का रहने वाला हूंँ, यह सम्मान मेरे गांव और जनपद का हो रहा है. मैं इसे कभी निजी उपलब्धि मानकर गर्वित नहीं हुआ, बल्कि मेरे परिवेश का सम्मान मानकर उसके जिम्मेदारियों से अपने आप को जोड़ लिया. मैं जो कुछ हूँ वह अपने परिवेश और माटी का उत्पाद हूँ. जब भागलपुर बिहार से ‘विद्यावचस्पति’ और उज्जैन में ‘भारत गौरव’ तथा ‘विद्या सागर’ की मानद उपाधियाँ मिली तो भी मैंने इसे निजी उपलब्धि नहीं माना, बल्कि मेरे जिले और परिवेश का सम्मान समझ कर अंगीकार किया. पत्रकारिता में उपमुख्यमंत्री के हाथों राजधानी लखनऊ में ‘अटल पत्रकारिता सम्मान’ हो, या दिल्ली में ‘भड़ास सम्मान’ हो या नजीबाबाद में मिला ‘परिधि सम्मान, सभी सम्मानों को सदैव यह समझ कर स्वीकार किया की यह मेरे आजमगढ़ का सम्मान है. इसे कभी घमंड और गर्व की विषय वस्तु नहीं बनने दिया. मैंने हमेशा यह महसूस की हर कार्य मेरे लिए अंतिम अवसर है.और मुझे वाच करने वाले देश भर में हैं, मेरे कार्यों को देखने और मान देने वाले हिंदी भाषी क्षेत्रों में ही नहीं अहिंदीभाषी क्षेत्रों में भी हैं. पत्रकारिता के संदर्भ में एमफिल और पीएचडी(शोधरत) का विषय भी पत्रकारिता लेकर इसी दिशा में जनसेवा का व्रत लिया. इस बीच अनेक बार ऐसे अवसर आए कि महानगरों मे किसी बड़े मीडिया हाउस में बड़ी पोस्ट को ग्रहण कर लूं, लेकिन गृह जनपद के प्रति मोह हर बार बाहर जाने से रोक दिया.और इसी शहर को गढ़ने और बनाने को अपनी नियति मान इसके कंटकाकीर्ण पथ को ही स्वीकार कर लिया. ‘शार्प रिपोर्टर’ और ‘मनमीत’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन मार्च 2008 से शुरू किया. दोनों पत्रिकाओं के अनेक ऐसे विशेषांक निकाले जिसकी धमक देशभर में हुई. अनेक विश्वविद्यालयों में शोध संदर्भ के रूप में काम आयी और निरंतर आ रही है. पुलिस कप्तान से लेकर पुलिस महानिदेशक के विरुद्ध आवरण कथा, से लेकर मुख्यमंत्री तक को निशाने पर लेने वाले प्रकाशनों के माध्यम से सवाल करने वाली परंपरा को आगे बढ़ाया. धमकी और मुकदमों को पत्रकारिता का स्वाभाविक आभूषण समझ आजमगढ़ से पत्रकारिता की शुरुआत करते हुए राज्य मुख्यालय लखनऊ की प्रेस मान्यता ग्रहण किया. हंस(दिल्ली) से लगायत जनसत्ता (दिल्ली) और जनसंदेश टाइम्स(लखनऊ) से लेकर संकल्य(हैदराबाद) आदि अनेक पत्र पत्रिकाओं में 350 से अधिक स्वतंत्र आलेख प्रकाशित होने के बाद भी लेशमात्र का भी गर्व नहीं हुआ कि इसे अहंकार और निजी उपलब्धि के रूप मे प्रचारित करूँ.

बल्कि यह सारी उपलब्धि मेरे अपनी माटी का है और मैं उसका ऋणी हमेशा रहूँगा, लेकिन कभी अपने जनपद पर उपकार नहीं किया, बल्कि अपना फर्ज समझ करता रहा और आगे भी करता रहूँगा और हां कभी उम्मीद भी नहीं करता की कोई सम्मान देगा. लेकिन कष्ट तब होता है जब किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान को देवालय बनाकर, उसके महिमा मंडन में तर्कहीन मूढ़, एक इंसान को भगवान बना देते हैं….!

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