आरक्षण की समीक्षा पर आखिर क्यों पीछे हटती है मोदी सरकार

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कांग्रेस के प्रथम कानून मंत्री अंबेडकर ने दलितों के लिए शैक्षणिक और राजनीतिक आरक्षण केवल 10 वर्षो के लिए लागू किया था जिसका अनुमोदन पं नेहरू तत्कालीन प्रधानमंत्री ने की थी। बल्लभ भाई पटेल जी इसका विरोध प्रारंभ से ही करते आये थे और संविधान सभा की बैठक भी छोड़ कर चले गये थे और पं नेहरू जी से यहां तक कह दिये थे कि किस बिमार आदमी को आप ने प्रारुप समिति का अध्यक्ष बना दिया है। यह बिमार आदमी तो इस देश को जिस रास्ते पर ले जाने की कोशिश कर रहा है कि देश 30से 40 वर्षों मे इसी आरक्षण के कारण टुकड़ों में बटने के कागार पर आ जाएगा।आगे बल्लभ भाई ने कहा कि मैं अखंड भारत के लिए 565 देशी रियासतों को भारत में विलय कराने मे लगा हूँ और अंबेडकर तो इस भारत को टुकड़ों मे बाटने के लिए आमादा है।यह सत्य है कि 1931मे पूना पैक्ट में अंबेडकर ने गांधी जी से भारत मे अलग दलिस्तान की मांग ही रख दी थी जबकि उस समय भारत गुलाम था लोग आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे और अंबेडकर जी अलग दलिस्तान की मांग पर अड़े हुए थे। यह अंबेडकर की दूषित मानसिकता का ही फल था। राजनीतिक मजबूरियों के वश पं नेहरू ने उस समय पटेल को समझा लिए क्योंकि पं नेहरू को दलित वोट का दरकार था। अंबेडकर उस समय इस्तीफा देने की बात कह डाली थी। अब दलित समाज के लिए आरक्षण लागू हो गया पुनः 10वर्ष बाद समीक्षा की बात संविधान मे वर्णित है पर आज तक समीक्षा नही हुई कारण वोट बैंक की तुष्टिकरण।मूल संविधान में इसके संदर्भ में केवल अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए 15%और 7.5% अर्थात 22.5%आरक्षण का प्राविधान था ।कालांतर में वीपी सिंह प्रधानमंत्री ने अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27%आरक्षण लागू किया जिसका समर्थन अटलजी ने 85सांसदों के साथ किया था।जबकि मंडल कमीशन की रिपोर्ट 1979मे बनकर संसद के पटल पर आ गई थी परन्तु इंदिरा गांधी ने1980से 1984तक उस रिपोर्ट को अपने श्यनकक्ष मे रखी रही ।1984से 1990तक राजीव गांधी ने उसे लागू नहीं किया था जिसके वजह से देश के अन्य पिछड़ा वर्ग कांग्रेस से दूरी बनाने लगे।पुनः विश्व नाथ प्रताप सिंह ने देवीलाल के दबाव और अटल बिहारी वाजपेयी की सहमति से इसे लागू किया।अब आगे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार दलित समाज के वोट के चक्कर मे दलित समाज के पक्ष मे मूल अधिकार मे समता के अधिकार अनुच्छेद 14से18को ओवरटेक करके 81वां संविधान संशोधन,82वांसंविधान संशोधन,85वां संविधान संशोधन संसद में अध्यादेशों के माध्यम (जिसे उम्र की रियायतें, शून्य अंक या कम अंक पर भी नौकरी या संस्थानों में प्रवेश, बैकलाग भर्तियां आदि)से पास करवाया। 2012 में मनमोहन सिंह की सरकार नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण का 117वां बिल लेकर आई थी विपक्ष मे अटल बिहारी वाजपेयी जी थे जो इस बिल का विरोध न करके समर्थन किया था।यह प्रमोशन में आरक्षण का लाभ केवल अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए था। इस बिल का विरोध केवल समाजवादी पार्टी ने की थी वह भी अपने राजनीतिक लाभ के लिए क्योंकि उस समय उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में सपा बसपा घोर विरोधी थे और प्रमोशन में आरक्षण की हिमायती मायावती थी और अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग लाभ से रहित था तो सामान्य वर्ग और पिछड़ों को साधने मे मुलायम सिंह यादव ने विरोध किया था जिसके कारण यह बिल पास नही हो सका था। अब नरेंद्र मोदी सरकार के कैबिनेट से इसे पास करवा दिया है और इसकेलिए नोटिफिकेशन भी जारी करवा दिया है मोदीजी ने। इधर बीच मोदीजी ने गरीब सवर्णों को 10% आरक्षण दिया वो भी आर्थिक आधार पर।यह आरक्षण 50.5% अनारक्षित सीमा मे से ही दिया वो भी आर्थिक आधार पर। अब अनारक्षित की सीमा 40.5% ही रह गया और आरक्षित वर्ग की सीमा 59.5% है गया।एक बात गौर करने की है कि जो गरीब सवर्ण 10%आरक्षण का लाभ लेगा जिसमे उम्र और फीस मे रियायत भी नही है वो मात्र 10% सीट के अन्तर्गत ही लड़ाई लड़ेगा और जो व्यक्ति अवशेष40.5% मे सामान्य अर्थात अनारक्षित वर्ग में आवेदन करेगा उसे 40.5% में लड़ाई लड़नी होगी।एक विसंगति यह भी है कि49.5%आरक्षण जाति आधारित है और मोदीजी ने 10%आरक्षण आर्थिक आधार पर दिया वो भी वार्षिक 8 लाख की आय तक के लिए मान्य है। एक सोचनीय बात यह है कि 8 लाख वार्षिक आय का मतलब लगभग 67 हजार मासिक आय। 67 हजार में तो बहुत सारे सवर्ण आ जाएंगे और सीट मात्र 10% ही रहेगी अर्थात 10% आर्थिक आधार के अनुसार आरक्षण का लाभ लेने वालों की संख्या बहुत अधिक हो जाएगी। यह एक छलावा है सवर्णों के लिए। यदि सही से आरक्षण का बटवारा करना होता है तो सम्पूर्ण आरक्षण को आर्थिक आधार पर सम्पूर्ण जाति के लिए करनी चाहिए तब जाकर वास्तव मे वास्तविक गरीब को इसका लाभ मिलता। विगत दिनों कई बार पब्लिक डोमेन और मीडिया के सामने कुंडा प्रतापगढ़ के विधायक व नवगठित पार्टी जनसत्ता दल ( लो०) के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुंवर रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने भी इस मुद्दे पर जोर देकर कहा कि आरक्षण का आधार गरीबी होना चाहिए और गरीब हर वर्ग,जाति, सम्प्रदाय मे होते है।उन्होंने यहां तक कहा कि दलित अधिकारियों और राजनेताओ को जो सम्पन्न हो चुके है वो अपने ही समाज के गरीब लोगों के लिए आरक्षण के लाभ को छोड़े। विदित हो कि एक सर्वेक्षण से जानकारी हुई है कि आरक्षण का लाभ अबतक 4% नये लोग ही ले पाये जबकि 96% वही परिवार परम्परागत से लेते आ रहा है जिसके दादा ,बाबा व पिता के बाद अब पुत्र/ पुत्री लाभ ले रहे है। राजा भैयाजी तो संविधान के मूलाधिकारों की बात करते हुए कहा था कि समानता के मूल अधिकार जो अनुच्छेद 14 से 18 के बीच सबके लिए समानता की बात वर्णित है अपने पार्टी का मूल मेनोफेस्टो मानकर पार्टी को आगे बढ़ा रहे है। विशेष जानकारी के लिए आप मुझसे सम्पर्क कर सकते है।
बीरेंद्र सिंह पत्रकार राष्ट्रीय संयोजक आरक्षण समीक्षा मोर्चा।मो० 9415391278.

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