अगर तुम हो सावन तो मैं प्यासी नदी हूं’!

Cinema culture

अभिषेक प्रकाश

– “विद्या कल फिर से बारिश होने वाली है।
-तो मैं अपना छाता लाऊंगी!
-तो चलो फिर मैं अपना नही लाता !”

लेकिन आपने तो मौका ही नही दिया! न आप आई और न बारिश की बूंदे ! वह गीत अभी भी गूंज रहा है जिसमें आप कहती हैं कि ‘अगर तुम हो सावन तो मैं प्यासी नदी हूं’!
खैर नदी वैसे ही इंतज़ार कर रही है जैसे रजनीगंधा का फूल! दोनों मुक्त होना चाह रहें हैं।

‘मुक्ति’ में दोनों ही गा रहे हैं कि ‘सुहानी चांदनी रातें हमें सोने नही देती,तेरे प्यार की बातें हमें सोने नही देती!’ सादगी कुछ ऐसी रही आपकी कि जिसने भी देखा वैसे ही देखा कि ‘तुम्हे देखती हूं तो लगता है ऐसे कि जैसे युगों से तुम्हे जानती हूं’!

प्यार को आपने भी तो कुछ ऐसे ही लिया, याद आता है संजीव कुमार के साथ वह दृश्य, जिसमें वह रात में अकेले दोनों को किसी के देख लेने पर बदनामी के डर का सवाल उठाते हैं, और आप उनके सवाल को ‘प्यार’ के लिए खारिज़ कर देती हैं। और कहती हैं कि ‘प्यार तो एक बार ही होता है बाकि तो लोग समझौते करते हैं!’

खैर तभी आप दोनों के बीच ‘वह’ याद आते हैं, जैसे ‘पति पत्नी और वो’ का कोई वह हो! जब ‘रजनीगंधा’ के उस सीन में कार के पिछली सीट के दोनों किनारों पर आप और दिनेश बैठे हुए हैं, तभी आपके साड़ी का आँचल दिनेश ठाकुर को जाकर ऐसे ही छू जाता है जैसे दोनों के ‘मन की सीमा रेखा’ छू गई हों! यह ‘एक छोटी सी ही बात’ है।लेकिन तभी मन्नू भंडारी पृष्टभूमि से कहने लगती हैं कि ‘यही सच है’ कि प्यार भले एक बार हो लेकिन प्यार कोई भी कर सकता है लेकिन ‘समझौता’ सभी नही कर पाते।ज़िन्दगी के लिए समझौते जरूरी हैं।

प्यार और समझौते पर लम्बी बहस हो सकती है लेकिन बालकनी में खड़ी माथे पर लाल बिंदी लगाए, प्रेम और निश्छल आंखों से रास्ते मे ऑटो ढूढते अपने पति के फिर वापस आने को लेकर आशान्वित उस औरत को जो रजनीगंधा के फूलों को अपने जुड़े में लगाए है और लाल किनारे की साड़ी में अपने को एक अनुपम सादगी से ऐसे ओढ़ रखी है जो किसी भी अनुरागी मन के लिए आकर्षण के विशेष मनोभाव को दस्तक देती हो, उसको ऐसे ही कैसे जाने दिया जाए!

लेकिन आप जा चुकी हैं और ‘यही अंतिम सच है’ लेकिन “रजनीगंधा” अभी भी आपके स्पर्श का इंतज़ार कर रहा है! आप आइएगा , आएंगी न !

(लेखक पुलिस अधिकारी हैं) 

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