शहीद किसी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र में नहीं बंधता

-अतुल मोहन लखनऊ। शहीद जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र का नहीं होता है। उसकी कोई सीमा नहीं होती है और उसे किसी परिधि में बांधा नहीं जा सकता है। आज़ादी के आंदोलन में गाय और सुअर की चर्बी लगी कारतूस का भारतीय सेना ने बहिष्कार किया। ब्रिटानिया हुकूमत के ख़िलाफ़ भारतीय सैनिक लड़े जबकि उनके […]

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ऐसी दो सत्य कथाएं, जिनको पढ़ने के बाद शायद आप भी अपनी ज़िंदगी जीने का अंदाज़ बदलना चाहें…

–आशुतोष सिंह कौशिक की वाल से*पहली* दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद ऐक बार नेल्सन मांडेला अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक रेस्तरां में खाना खाने गए। सबने अपनी अपनी पसंद का खाना आर्डर किया और खाना आने का इंतजार करने लगे। उसी समय मांडेला की सीट के सामने वाली सीट पर एक व्यक्ति […]

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बादशाह खान मतलब खान अब्दुल गफ्फार खान को याद करते हुए

स्वतंत्रता दिवस विशेष :- देश की आजादी और उत्तर – पश्चिम सीमांत क्षेत्र की पठान आबादी के सर्वोमुखी विकास जैसे उदात्त उद्देश्यों के लिए जीवन भर अहिंसक संघर्ष जारी रखने वाले बादशाह खान सही मायने में मानवता के सच्चे खिदमतगार थे | उन्होंने अपना सारा जीवन अंग्रेजों के शोषण से मुक्ति , पठानों के जीवन […]

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रामायण और डाoलोहिया

भारत का समाजवादी आंदोलन और लोहिया जी वस्तुतः एक दूसरे के पर्याय है ।१९६७ में सँविद सरकारें  उप्र विहार मप्र आदि में जो बनी थीं उसकी मूल प्रेरणा में डा० राम मनोहर लोहिया जी और भारतीय जनसंघ के पं दीन दयाल उपाध्याय जी थे। दोनों महानायकों का असामयिक और आकस्मिक निधन और हत्या वस्तुतः भारतीय […]

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साल के 8 महीने जब ओडिशा में बीतने लगे तो लोगों ने वहीं बसने की सलाह दी

-अमरेन्द्र किशोर जनवरी के महीने में सिरपुर-सेरगढ़ से आगे हम बालीगुड़ा जाने के रास्ते उरलादानी पहुँचते हैं। इलाके में सामान्य चहल-पहल है। निखरी हुई धूप है और सामने साल के पेड़ों से ढंके पहाड़ों पर पोदू (झूम) खेती के चिन्ह साफ़ दिख रहे हैं। पहाड़ की ढालू भूमि पर जंगलों का सफाया आदिवासियों ने बेहद […]

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सियासत में साहित्य के स्वर

-गिरीश पंकज साहित्य हमारे जीवन को कितना प्रभावित करता है इसे समझने के लिए आए दिन हम उन घटनाओं को याद कर सकते हैं, जिनमें सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी अपनी बात की पुष्टि करने के लिए कई बार शेरो शायरी, दोहे,चौपाई का सहारा लेता रहता है ।और राजनीति में तो अनेक बार नेता कविता […]

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एक नजर लखनऊ रेजीडेन्सी पर…

एसके दत्ता ब्रिटिश साम्राज्य के इतिहास में लखनऊ की रेजीडेन्सी का विशेष महत्व है | अंग्रेज इसे अपने गौरव के प्रतीक रूप में देखते है | वे इसे कितना महत्व देते है , इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में इंग्लैण्ड का झंडा यूनियन जैक केवल दो स्थानों […]

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वो मेरे कुलीन ब्राह्मण ! तुम्हारा अधिकार है कि तुम किसी म्लेच्छ के हाथ का छुआ खाना त्याग दो..

–कुमार रमेश तुमने जो किया वो कोई नई बात नही है, हजारों साल से इस महान राष्ट्र की नसों में बह रहा.दोगलापन तो हमलोगों के जीन में है.दलित आपके खेत मे काम करेगा. गेहूं बोयेगा, धान रोपेगा, निराई-गुड़ाई करेगा, काट लाएगा, आपके ओसारे में रख देगा तबतक उस दलित का छूत आपके धान-गेहूं-आलू प्याज में […]

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विजयी भव जितेंद्र!तुम सच्चे मायने में नायक हो…

एक तरफ रेपिस्ट विधायक सेंगर है जो दुष्कर्म करने के बाद पीड़िता का जान ही लेना नहीं चाहता वरन गवाही और साथ देने वाले परिवार को पूरी तरह खत्म करवा देना चाहता है। दूसरी तरफ जींद हरियाणा का ही एक किसान जितेंद्र छातर है जो एक गैंग रेप पीड़िता के लिए भगवान बन गया है।पीड़िता […]

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कानून ! ये हाथ मुझे दे दे…

-संजीव जायसवाल ‘संजय’ सारी गणित फिट हो चुकी थी । बड़ी-बड़ी पार्टियां गब्बर सिंह को टिकट देने के लिये राजी थीं । राजी क्या थीं बिल्कुल होड़ मची थी । कोई गब्बर सिंह का पूरा चुनावी खर्च उठाने के लिये तैयार था तो कोई बोनस में सांभा और कालिया को भी टिकट देने को उतावला […]

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